अध्याय १०

शान्ति

भूमिका

वैराग्य की चर्चा के बाद अष्टावक्र अब उसी भाव को और मूर्त रूप देते हैं — मित्र, धन, घर, पत्नी, उपहार जैसी सांसारिक वस्तुओं का प्रत्यक्ष उल्लेख करते हुए। यह अध्याय सिद्धांत से व्यवहार की ओर उतरता है, यह दिखाते हुए कि वैराग्य का ठोस अर्थ रोज़मर्रा के जीवन में क्या है। शीर्षक "शान्ति" इसलिए सार्थक है — इच्छा के त्याग से जो शेष रहता है, वह शान्ति ही है। इस अध्याय में एक भावनात्मक गहराई भी है जो पिछले अध्यायों में उतनी स्पष्ट नहीं थी — विशेषकर अंतिम श्लोकों में, जहाँ अष्टावक्र की वाणी में लगभग एक आह्, एक थकान का स्वर सुनाई देता है।

श्लोक १०.१

मूल श्लोक (संस्कृत)

अष्टावक्र उवाच ॥ विहाय वैरिणं काममर्थं चानर्थसङ्कुलम् । धर्ममप्येतयोर्हेतुं सर्वत्रानादरं कुरु ॥ १०-१॥

भावार्थ

इच्छा त्यागो, जो शत्रु है। समृद्धि त्यागो, जो उपद्रव और शुभ कर्मों से जन्मती है। उदासीन बनो।

यहाँ चौंकाने वाली बात यह है कि समृद्धि को केवल "उपद्रव" से ही नहीं, "शुभ कर्मों" से भी उत्पन्न बताया गया है — अर्थात सत्कर्म भी यदि फल की इच्छा के साथ किए जाएँ, तो वे भी बंधन की जड़ बन सकते हैं। यह भारतीय कर्म-सिद्धांत की एक सूक्ष्म परत को उजागर करता है — यह केवल बुरे कर्म नहीं जो बंधन बनाते हैं, बल्कि "फल की इच्छा से किया गया कोई भी कर्म" बंधन का कारण बन सकता है, चाहे वह कर्म कितना भी नैतिक या पवित्र क्यों न हो।

श्लोक १०.२

मूल श्लोक (संस्कृत)

स्वप्नेन्द्रजालवत् पश्य दिनानि त्रीणि पञ्च वा । मित्रक्षेत्रधनागारदारदायादिसम्पदः ॥ १०-२॥

भावार्थ

मित्रों, भूमि, धन, घर, पत्नियों, उपहारों — और समस्त प्रतीत होने वाले सौभाग्य को एक बीतते हुए दृश्य के रूप में देखो, तीन-पाँच दिन के स्वप्न के समान।

जीवन की अवधि की तुलना एक लघु स्वप्न से करना भारतीय साहित्य की पुरानी परम्परा है। यह निराशावाद नहीं, बल्कि परिप्रेक्ष्य है — जो वस्तुएँ स्थायी प्रतीत होती हैं, वे वास्तव में कितनी क्षणभंगुर हैं, इसका स्मरण दिलाना। "तीन-पाँच दिन" यह विशिष्ट संख्या रोचक है — यह किसी लम्बी अवधि की बात नहीं करती, बल्कि एक अत्यंत संक्षिप्त अवधि की, जैसे किसी यात्रा के दौरान एक धर्मशाला में कुछ रातें बिताना, जहाँ से आगे बढ़ जाना ही स्वाभाविक और अपेक्षित है।

श्लोक १०.३

मूल श्लोक (संस्कृत)

यत्र यत्र भवेत्तृष्णा संसारं विद्धि तत्र वै । प्रौढवैराग्यमाश्रित्य वीततृष्णः सुखी भव ॥ १०-३॥

भावार्थ

जहाँ इच्छा है, वहाँ जगत है। अनासक्ति में दृढ़ रहो। इच्छा से मुक्त रहो। प्रसन्न रहो।

यह संक्षिप्त सूत्र इस अध्याय का केन्द्र है — "जहाँ इच्छा है, वहाँ जगत है।" जगत कोई बाहरी वस्तु नहीं जिससे भागा जाए, यह इच्छा द्वारा निर्मित एक अनुभव है। इच्छा शान्त होते ही जगत का दबाव भी शान्त हो जाता है। यह कथन अध्याय ८ के "जब मैं नहीं है, तब केवल मुक्ति है" से सीधा जुड़ा है — जहाँ "मैं" बंधन की जड़ था, वहाँ यहाँ "इच्छा" को जगत के निर्माण की जड़ बताया गया है — दोनों वास्तव में एक ही घटना के दो पहलू हैं।

श्लोक १०.४

मूल श्लोक (संस्कृत)

तृष्णामात्रात्मको बन्धस्तन्नाशो मोक्ष उच्यते । भवासंसक्तिमात्रेण प्राप्तितुष्टिर्मुहुर्मुहुः ॥ १०-४॥

भावार्थ

बंधन और इच्छा एक ही हैं। इच्छा को नष्ट करो और मुक्त हो जाओ। केवल जगत से विलग होकर ही व्यक्ति आनन्दपूर्वक आत्मा को साकार कर सकता है।
श्लोक १०.५

मूल श्लोक (संस्कृत)

त्वमेकश्चेतनः शुद्धो जडं विश्वमसत्तथा । अविद्यापि न किञ्चित्सा का बुभुत्सा तथापि ते ॥ १०-५॥

भावार्थ

तुम एक हो — स्वयं चैतन्य। जगत न तो जागरूक है, न उसका अस्तित्व है। यहाँ तक कि अज्ञान भी असत्य है। जानने के लिए और क्या शेष है?

यह श्लोक ज्ञान की सीमा को ही चुनौती देता है — यदि अज्ञान स्वयं असत्य है, तो "ज्ञान प्राप्त करना" यह विचार भी अंततः एक भ्रम की श्रेणी में आ जाता है। जो शेष रहता है वह केवल विश्राम है, प्राप्ति नहीं। यह श्लोक साधना-मार्ग के एक विरोधाभास को छूता है — यदि अज्ञान असत्य है, तो अज्ञान से मुक्त होने के लिए किए जाने वाले सारे प्रयास भी अंततः एक असत्य समस्या का समाधान खोजने जैसे हैं; असली विश्राम इस पूरी खोज को ही रोक देने में है।

श्लोक १०.६

मूल श्लोक (संस्कृत)

राज्यं सुताः कलत्राणि शरीराणि सुखानि च । संसक्तस्यापि नष्टानि तव जन्मनि जन्मनि ॥ १०-६॥

भावार्थ

जिन राज्यों, पुत्रों, पत्नियों, देहों, सुखों से तुम आसक्त रहे हो — जन्म-जन्मांतर — वे अब सदा के लिए खो चुके हैं।

एक कठोर पर सत्य वचन — जीवन-दर-जीवन जिन वस्तुओं को व्यक्ति ने पकड़ा, वे सब पहले ही खो चुकी हैं, स्मृति में भी शेष नहीं। यह स्मरण आसक्ति की निरर्थकता को उजागर करता है। यह श्लोक विशेष रूप से मार्मिक है क्योंकि यह किसी अमूर्त दार्शनिक सिद्धांत की बात नहीं करता, बल्कि सीधे उन ठोस, प्रिय वस्तुओं की बात करता है जिनसे मनुष्य अपना जीवन जोड़ता है — राज्य, संतान, जीवनसाथी, देह — और यह याद दिलाता है कि ये सब पहले भी अनगिनत बार खोए जा चुके हैं, बिना किसी स्थायी क्षति के, क्योंकि आत्मा इन सब खोने-पाने से अप्रभावित रही।

श्लोक १०.७

मूल श्लोक (संस्कृत)

अलमर्थेन कामेन सुकृतेनापि कर्मणा । एभ्यः संसारकान्तारे न विश्रान्तमभून् मनः ॥ १०-७॥

भावार्थ

समृद्धि, सुख, पुण्य कर्म... बस बहुत हुआ! जगत के निर्जन वन में मन को विश्राम नहीं मिलता।

"बस बहुत हुआ!" — यह वाक्य असामान्य रूप से भावुक और सीधा है, मानो थकान की एक गहरी आह। अष्टावक्र यहाँ शुष्क दर्शन नहीं दे रहे, वे उस थकान को छू रहे हैं जो हर मनुष्य कभी न कभी अनुभव करता है — पुण्य कर्म करते-करते, सुख खोजते-खोजते भी मन को शान्ति नहीं मिलती। "जगत के निर्जन वन" यह उपमा भी सार्थक है — वन में मनुष्य भटकता है, दिशा खो देता है, विश्राम का कोई स्थिर स्थान नहीं पाता; ऐसे ही जगत में समृद्धि और सुख की खोज एक अंतहीन भटकाव बन जाती है।

श्लोक १०.८

मूल श्लोक (संस्कृत)

कृतं न कति जन्मानि कायेन मनसा गिरा । दुःखमायासदं कर्म तदद्याप्युपरम्यताम् ॥ १०-८॥

भावार्थ

कितने जन्मों तक तुमने देह, मन और वाणी से कठोर और पीड़ादायक श्रम किया है? अब रुकने का समय है।

अध्याय का समापन एक कोमल पर दृढ़ आह्वान से होता है — "अब रुकने का समय है।" यह श्रम को अपमानित करना नहीं, बल्कि यह पहचानना है कि यह श्रम कभी अंततः तृप्ति नहीं दे सका, और अब विश्राम ही एकमात्र सार्थक दिशा है। "देह, मन और वाणी" — तीनों माध्यमों का उल्लेख यह दर्शाता है कि यह श्रम केवल शारीरिक नहीं रहा, बल्कि मानसिक (चिंतन, योजना) और वाचिक (संवाद, तर्क) रूप से भी निरन्तर चलता रहा है — और अब इन तीनों स्तरों पर ही विश्राम की आवश्यकता है।

अगले अध्याय में अष्टावक्र इसी विश्राम के दर्शन को और गहरा करेंगे, अस्तित्व और अनस्तित्व के परिवर्तनशील स्वभाव की चर्चा करते हुए। -e