अध्याय ९

वैराग्य

भूमिका

बंधन और मुक्ति की परिभाषा देने के बाद अष्टावक्र अब वैराग्य के स्वरूप का विस्तार से वर्णन करते हैं। यहाँ वैराग्य कोई उदासी या पलायन नहीं है — यह जगत के प्रति एक गहरी, शांत समझ है, जिसमें कर्तव्य और अकर्तव्य के अंतहीन चक्र से मुक्ति की चाह जन्म लेती है। अष्टावक्र इस अध्याय में जगत की नश्वरता और मनुष्यों के मतभेदों की ओर संकेत करते हुए विरक्ति के स्वाभाविक उदय की बात करते हैं। यह अध्याय आठ श्लोकों का है और इसकी गति अध्याय ८ से भिन्न है — वहाँ शुष्क परिभाषा थी, यहाँ वैराग्य के उदय के विविध कारणों और रूपों का सजीव चित्रण है।

श्लोक ९.१

मूल श्लोक (संस्कृत)

अष्टावक्र उवाच ॥ कृताकृते च द्वन्द्वानि कदा शान्तानि कस्य वा । एवं ज्ञात्वेह निर्वेदाद् भव त्यागपरोऽव्रती ॥ ९-१॥

भावार्थ

विरोधी शक्तियाँ, किए और अनकिए कर्तव्य — यह कब समाप्त होगा और किसके लिए? इस पर विचार करते हुए, सदा इच्छारहित रहो, सब कुछ त्याग दो, और जगत की ओर उदासीन दृष्टि रखो।

कर्तव्यों की सूची कभी पूरी नहीं होती — एक कर्तव्य पूरा होते ही दूसरा प्रकट हो जाता है, जैसे एक लहर शांत होते ही दूसरी उठ खड़ी होती है। अष्टावक्र इस अंतहीनता की ओर संकेत करते हैं, ताकि जनक कर्तव्यों की दौड़ में उलझने के बजाय उनके मूल स्वभाव को पहचान सकें — कि यह दौड़ स्वभावतः कभी समाप्त नहीं होने वाली, इसलिए इसके "समाप्त होने" की प्रतीक्षा में शान्ति खोजना व्यर्थ है। शान्ति कर्तव्यों के पूर्ण होने में नहीं, उनके प्रति दृष्टिकोण में खोजी जानी चाहिए।

श्लोक ९.२

मूल श्लोक (संस्कृत)

कस्यापि तात धन्यस्य लोकचेष्टावलोकनात् । जीवितेच्छा बुभुक्षा च बुभुत्सोपशमं गताः ॥ ९-२॥

भावार्थ

दुर्लभ और धन्य है वह जिसकी जीने, भोगने और जानने की इच्छा मनुष्यों के आचरण को देखकर बुझ गई हो।

यह श्लोक वैराग्य के जन्म का एक स्रोत बताता है — संसार का गहन अवलोकन। जब मनुष्य लोगों के आचरण, उनकी तृष्णाओं, उनकी दौड़ को ध्यान से देखता है, तब स्वाभाविक रूप से एक विरक्ति उपजती है, बिना किसी उपदेश के। यह विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है कि तीन इच्छाएँ गिनाई गई हैं — जीने की इच्छा (दीर्घायु), भोगने की इच्छा (सुख), जानने की इच्छा (ज्ञान) — ये तीनों साधारणतः शुभ मानी जाती हैं, पर गहन अवलोकन से यह भी दिखता है कि इनका पीछा करना भी अंततः वही अशांति उत्पन्न करता है जो अन्य इच्छाओं से होती है।

श्लोक ९.३

मूल श्लोक (संस्कृत)

अनित्यं सर्वमेवेदं तापत्रितयदूषितम् । असारं निन्दितं हेयमिति निश्चित्य शाम्यति ॥ ९-३॥

भावार्थ

सब वस्तुओं को त्रिविध दुःख के रूप में देखकर, साधु शान्त हो जाता है। असार, क्षणभंगुर, तुच्छ — जगत केवल त्याग के योग्य है।

भारतीय दर्शन में "त्रिविध दुःख" (आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक) एक प्रसिद्ध वर्गीकरण है — दुःख जो स्वयं के शरीर-मन से उपजता है, दुःख जो अन्य प्राणियों और वस्तुओं से आता है, और दुःख जो प्राकृतिक या दैवी शक्तियों से आता है। जब यह देखा जाए कि जीवन का हर पक्ष किसी न किसी रूप में इस त्रिविध दुःख से घिरा है, तब वैराग्य स्वाभाविक रूप से उपजता है — यह कोई कृत्रिम निराशावाद नहीं, बल्कि एक यथार्थवादी मूल्यांकन है।

श्लोक ९.४

मूल श्लोक (संस्कृत)

कोऽसौ कालो वयः किं वा यत्र द्वन्द्वानि नो नृणाम् । तान्युपेक्ष्य यथाप्राप्तवर्ती सिद्धिमवाप्नुयात् ॥ ९-४॥

भावार्थ

क्या कभी कोई युग या समय था जब मनुष्य विरोधाभासों के बिना जीते थे? विरोधाभासों को पीछे छोड़ दो। जो आए उसी में संतुष्ट रहो। यही पूर्णता है।

यह श्लोक एक भ्रम को तोड़ता है — यह आशा कि किसी स्वर्णयुग में या भविष्य में विरोधाभास-रहित जीवन सम्भव होगा। अष्टावक्र स्पष्ट करते हैं — सुख-दुःख, लाभ-हानि सदा साथ-साथ चलते रहे हैं और चलते रहेंगे; पूर्णता उनसे मुक्ति में नहीं, उन्हें स्वीकार करने में है। यह सत्य विशेष रूप से आधुनिक मन के लिए भी प्रासंगिक है, जो प्रायः यह मानता है कि "यदि यह समस्या हल हो जाए, तो शांति मिल जाएगी" — जबकि अनुभव बार-बार दिखाता है कि एक समस्या के समाधान के साथ ही अगली समस्या प्रकट हो जाती है।

श्लोक ९.५

मूल श्लोक (संस्कृत)

नाना मतं महर्षीणां साधूनां योगिनां तथा । दृष्ट्वा निर्वेदमापन्नः को न शाम्यति मानवः ॥ ९-५॥

भावार्थ

महानतम ऋषि, संत और योगी बहुत कम बातों पर सहमत होते हैं। यह देखकर, कौन ज्ञान के प्रति उदासीन न हो और स्थिर न हो जाए?

यह श्लोक विचित्र प्रतीत हो सकता है, पर इसका आशय गहरा है — यदि महानतम ज्ञानी भी परस्पर सहमत नहीं होते (विभिन्न दार्शनिक सम्प्रदाय, विभिन्न साधना-पद्धतियाँ, परस्पर विरोधी सिद्धांत), तो बौद्धिक सिद्धांतों और मतों में उलझना व्यर्थ है। सत्य शब्दों और मतों से परे है। यह श्लोक साधक को शास्त्रार्थ और वाद-विवाद के जाल से बाहर निकलने का आमंत्रण देता है — यह सुझाव देते हुए कि अंतिम सत्य किसी एक सम्प्रदाय के विजय में नहीं, बल्कि इन सभी मतभेदों से ऊपर उठने में है।

श्लोक ९.६

मूल श्लोक (संस्कृत)

कृत्वा मूर्तिपरिज्ञानं चैतन्यस्य न किं गुरुः । निर्वेदसमतायुक्त्या यस्तारयति संसृतेः ॥ ९-६॥

भावार्थ

जो सांसारिक उदासीनता के द्वारा, शांति और विवेक के द्वारा अपने वास्तविक स्वरूप को देखता है और भ्रम से बच निकलता है — क्या वह सच्चा गुरु नहीं है?

यह श्लोक गुरु की परिभाषा प्रस्तुत करता है — पारम्परिक अर्थ में गुरु वह होता है जो शिष्यों को दीक्षा देता है, शास्त्र सिखाता है। पर अष्टावक्र यहाँ एक भिन्न, अधिक आन्तरिक परिभाषा देते हैं — सच्चा गुरु वह है जिसने स्वयं अपनी उदासीनता, शांति और विवेक के द्वारा भ्रम से मुक्ति पाई हो। यह श्लोक अप्रत्यक्ष रूप से यह भी संकेत करता है कि हर सच्चा जिज्ञासु स्वयं अपने भीतर के गुरु-तत्त्व को जगा सकता है।

श्लोक ९.७

मूल श्लोक (संस्कृत)

पश्य भूतविकारांस्त्वं भूतमात्रान् यथार्थतः । तत्क्षणाद् बन्धनिर्मुक्तः स्वरूपस्थो भविष्यसि ॥ ९-७॥

भावार्थ

सृष्टि के अनगिनत रूपों में केवल मूल तत्त्व को देखो। तुम तुरन्त मुक्त हो जाओगे, और आत्मा में स्थित रहोगे।

फिर से "तुरन्त" शब्द आता है — इस गीता की एक निरंतर प्रतिज्ञा। सृष्टि के अनगिनत रूप — पेड़, पक्षी, मनुष्य, पर्वत, नदियाँ — इन सभी की विविधता में एक ही मूल तत्त्व व्याप्त है। जब यह देखने की दृष्टि विकसित होती है (रूपों में मूल तत्त्व को देखना, न कि रूपों को ही अंतिम सत्य मानना), मुक्ति दूरस्थ लक्ष्य नहीं रह जाती।

श्लोक ९.८

मूल श्लोक (संस्कृत)

वासना एव संसार इति सर्वा विमुञ्च ताः । तत्त्यागो वासनात्यागात्स्थितिरद्य यथा तथा ॥ ९-८॥

भावार्थ

इच्छा जगत की रचना करती है — उसे त्याग दो। इच्छाओं को त्यागकर तुम जगत को त्याग देते हो। अब तुम जैसे हो वैसे जी सकते हो।

अध्याय का समापन एक सुन्दर विरोधाभास से होता है — जगत को त्यागने के लिए कहीं जाने की, कुछ छोड़ने की आवश्यकता नहीं, केवल इच्छा का त्याग पर्याप्त है। और उसके बाद "जैसे हो वैसे जी सकते हो" — अर्थात कोई विशेष जीवन-शैली अपनाने की भी आवश्यकता नहीं, स्वाभाविकता ही पर्याप्त है। यह अंतिम पंक्ति महत्वपूर्ण है क्योंकि यह वैराग्य को त्याग-मार्ग (सन्यास) की बाहरी संरचना से मुक्त कर देती है — जनक, एक राजा, अपने राज्य को त्यागे बिना ही, अपने पद पर रहते हुए ही इस वैराग्य को जी सकते हैं, क्योंकि असली त्याग बाहरी नहीं, आन्तरिक है।

वैराग्य की इस चर्चा के बाद अगले अध्याय में अष्टावक्र और गहराई से "शान्ति" के स्वरूप में उतरेंगे, मित्रों-सम्पत्ति-सुख के त्याग की बात करते हुए। -e