अध्याय १८

परम शान्ति

भूमिका

यह गीता का सबसे विशाल अध्याय है — पूरे एक सौ श्लोक। यहाँ अष्टावक्र मानो अपनी सम्पूर्ण शिक्षा का सार, अपनी अंतिम और सबसे सघन शिक्षा प्रस्तुत करते हैं। जनक की प्रस्तावना में लिखा है — "अध्याय १८: अंततः, अष्टावक्र उस पर अपना सब कुछ उड़ेल देते हैं — शुद्ध अद्वैत के १०० श्लोक। यदि यह काम न आए, तो कुछ भी काम नहीं आएगा।" इस विशाल अध्याय को हम चार भागों में विभाजित करके पढ़ेंगे, ताकि प्रत्येक श्लोक को पूरा न्याय मिल सके। यह पहला भाग श्लोक १ से २५ तक है, जो सामान्य घोषणाओं से आरम्भ होकर सांसारिक क्रियाकलाप और ज्ञानी की तटस्थता की गहन चर्चा तक पहुँचता है।

श्लोक १८.१

मूल श्लोक (संस्कृत)

अष्टावक्र उवाच ॥ यस्य बोधोदये तावत्स्वप्नवद् भवति भ्रमः । तस्मै सुखैकरूपाय नमः शान्ताय तेजसे ॥ १८-१॥

भावार्थ

उस तत्त्व की स्तुति करो, जो आनन्द स्वरूप है, जो स्वभाव से शांति और प्रकाश है, और जो अपने ज्ञान द्वारा जगत को स्वप्न के रूप में उद्घाटित करता है।

अध्याय का आरम्भ एक स्तुति से होता है — यह असामान्य है क्योंकि अष्टावक्र गीता मुख्यतः शुद्ध ज्ञान-मार्ग का ग्रंथ है, स्तुति-प्रधान भक्ति-ग्रंथ नहीं। पर यहाँ इस विशाल अध्याय के आरम्भ में एक क्षण के लिए भक्ति का स्वर भी मिश्रित हो जाता है — मानो अंतिम, सबसे गहरी शिक्षा से पहले एक श्रद्धांजलि आवश्यक हो।

श्लोक १८.२

मूल श्लोक (संस्कृत)

अर्जयित्वाखिलान् अर्थान् भोगानाप्नोति पुष्कलान् । न हि सर्वपरित्यागमन्तरेण सुखी भवेत् ॥ १८-२॥

भावार्थ

मनुष्य जगत के प्रचुर सुखों का भोग कर सकता है, पर वह कभी सुखी नहीं होगा जब तक इन्हें त्याग न दे।
श्लोक १८.३

मूल श्लोक (संस्कृत)

कर्तव्यदुःखमार्तण्डज्वालादग्धान्तरात्मनः । कुतः प्रशमपीयूषधारासारमृते सुखम् ॥ १८-३॥

भावार्थ

जिसका अंतरतम हृदय कर्तव्य से उत्पन्न दुःख के सूर्य से झुलस गया हो, वह स्थिरता की तीव्र वर्षा के बिना कैसे सुखी हो सकता है?

"कर्तव्य से उत्पन्न दुःख के सूर्य" और "स्थिरता की तीव्र वर्षा" — यह उपमा भारतीय जलवायु से सीधे उपजी है, जहाँ ग्रीष्म की झुलसाने वाली गर्मी के बाद मानसून की वर्षा एक गहरी राहत लेकर आती है। कर्तव्यों का बोझ मन को उसी तरह झुलसाता है जैसे तपती धूप, और केवल गहरी, आंतरिक स्थिरता ही उस राहत को ला सकती है जो वर्षा लाती है।

श्लोक १८.४

मूल श्लोक (संस्कृत)

भवोऽयं भावनामात्रो न किञ्चित् परमार्थतः । नास्त्यभावः स्वभावानां भावाभावविभाविनाम् ॥ १८-४॥

भावार्थ

जगत चैतन्य में केवल एक विचार है। वास्तविकता में यह कुछ भी नहीं। जो अस्तित्व और अनस्तित्व के सच्चे स्वभाव को देखता है, वह कभी अस्तित्व से बाहर नहीं होता।

एक गहन विरोधाभासी कथन — "वह कभी अस्तित्व से बाहर नहीं होता" (never ceases to exist)। यह श्लोक मृत्यु के भय को अंतिम रूप से समाप्त करता है — जो व्यक्ति यह समझ लेता है कि अस्तित्व और अनस्तित्व दोनों ही मन के विचार हैं, न कि परम सत्य, वह इन दोनों की सीमा से परे चला जाता है, और इसलिए न उसका "होना" वास्तविक है, न उसका "न होना" — वह उस स्तर पर स्थित है जहाँ यह प्रश्न ही निरर्थक हो जाता है।

श्लोक १८.५

मूल श्लोक (संस्कृत)

न दूरं न च सङ्कोचाल्लब्धमेवात्मनः पदम् । निर्विकल्पं निरायासं निर्विकारं निरञ्जनम् ॥ १८-५॥

भावार्थ

आत्मा — जो निरपेक्ष, सहज, कालातीत, निर्मल है — सीमाओं से रहित है और तुमसे किसी दूरी पर नहीं। तुम सदा वही हो।

"तुमसे किसी दूरी पर नहीं" यह वाक्यांश विशेष रूप से आश्वासनदायक है — यह इस भ्रम को दूर करता है कि आत्मा कोई दूरस्थ, प्राप्त करने योग्य वस्तु है। दूरी की अवधारणा ही स्थान और समय से जुड़ी है, और आत्मा दोनों से परे है, इसलिए "दूरी" का प्रश्न ही उस पर लागू नहीं होता।

श्लोक १८.६

मूल श्लोक (संस्कृत)

व्यामोहमात्रविरतौ स्वरूपादानमात्रतः । वीतशोका विराजन्ते निरावरणदृष्टयः ॥ १८-६॥

भावार्थ

जिनकी दृष्टि निर्मल हो जाती है, उनके लिए भ्रम विलीन हो जाता है और आत्मा ज्ञात हो जाती है। सारा दुःख तुरन्त दूर हो जाता है।
श्लोक १८.७

मूल श्लोक (संस्कृत)

समस्तं कल्पनामात्रमात्मा मुक्तः सनातनः । इति विज्ञाय धीरो हि किमभ्यस्यति बालवत् ॥ १८-७॥

भावार्थ

सब कुछ कल्पना है, यह देखकर, कालातीत रूप से मुक्त स्वयं को जानते हुए, साधु बालक की भाँति जीता है।

"बालक की भाँति जीना" यह उपमा गीता में बार-बार लौटती है (अध्याय १६ में भी आई थी) — बालक बिना गणना के, बिना पूर्वाग्रह के, हर क्षण को पूर्णतः जीता है। यह उपमा ज्ञानी की सहजता को पकड़ने के लिए सबसे उपयुक्त मानी गई है, क्योंकि बालक की सहजता अज्ञान से आती है जबकि ज्ञानी की सहजता ज्ञान से — पर बाहरी रूप से दोनों समान दिखते हैं।

श्लोक १८.८

मूल श्लोक (संस्कृत)

आत्मा ब्रह्मेति निश्चित्य भावाभावौ च कल्पितौ । निष्कामः किं विजानाति किं ब्रूते च करोति किम् ॥ १८-८॥

भावार्थ

स्वयं को निरपेक्ष जानकर, अस्तित्व और अनस्तित्व को कल्पना मात्र जानकर, इच्छारहित व्यक्ति के पास सीखने, कहने या करने के लिए क्या शेष है?
श्लोक १८.९

मूल श्लोक (संस्कृत)

अयं सोऽहमयं नाहमिति क्षीणा विकल्पना । सर्वमात्मेति निश्चित्य तूष्णीम्भूतस्य योगिनः ॥ १८-९॥

भावार्थ

यह निश्चय जानकर कि सब कुछ आत्मा है, ज्ञानी के मन में "मैं यह हूँ" या "मैं वह नहीं हूँ" जैसे विचारों का लेशमात्र भी शेष नहीं रहता।
श्लोक १८.१०

मूल श्लोक (संस्कृत)

न विक्षेपो न चैकाग्र्यं नातिबोधो न मूढता । न सुखं न च वा दुःखमुपशान्तस्य योगिनः ॥ १८-१०॥

भावार्थ

स्थिरता पाने वाला योगी न विचलित होता है, न केन्द्रित। वह न सुख जानता है, न दुःख। अज्ञान दूर होने पर, वह ज्ञान से भी मुक्त है।

"ज्ञान से भी मुक्त है" यह अंतिम पंक्ति विशेष ध्यान माँगती है — यह गीता की एक निरन्तर शिक्षा को दोहराती है कि यहाँ तक कि "ज्ञान" की अवधारणा भी अंततः पार करनी होती है, क्योंकि ज्ञान अज्ञान के विपरीत ध्रुव पर खड़ा है, और द्वैत के दोनों ध्रुवों से मुक्त होना ही परम अवस्था है।

श्लोक १८.११

मूल श्लोक (संस्कृत)

स्वाराज्ये भैक्षवृत्तौ च लाभालाभे जने वने । निर्विकल्पस्वभावस्य न विशेषोऽस्ति योगिनः ॥ १८-११॥

भावार्थ

पार्थिव, इंद्रिय-भोग, समृद्धि, वस्तुओं का विवेक — इनका ज्ञानी के लिए कोई महत्व नहीं जो विरोधाभासों से मुक्त है।
श्लोक १८.१२

मूल श्लोक (संस्कृत)

क्व धर्मः क्व च वा कामः क्व चार्थः क्व विवेकिता । इदं कृतमिदं नेति द्वन्द्वैर्मुक्तस्य योगिनः ॥ १८-१२॥

भावार्थ

धार्मिक पुण्य, इंद्रिय-सुख, सांसारिक समृद्धि, इस और उस में भेद — इनका विरोधाभासों से मुक्त योगी के लिए कोई महत्व नहीं जिसके "मैं यह करता हूँ" और "यह मैं नहीं करता" जैसे भाव शेष नहीं।
श्लोक १८.१३

मूल श्लोक (संस्कृत)

कृत्यं किमपि नैवास्ति न कापि हृदि रञ्जना । यथा जीवनमेवेह जीवन्मुक्तस्य योगिनः ॥ १८-१३॥

भावार्थ

जीवनमुक्त (जीते-जी मुक्त) योगी का इस जगत में कोई कर्तव्य नहीं, हृदय में कोई आसक्ति नहीं। उसका जीवन उसके बिना ही आगे बढ़ता है।

"उसका जीवन उसके बिना ही आगे बढ़ता है" यह पंक्ति अत्यंत गहन है — यह "जीवनमुक्ति" (जीते-जी मुक्ति होना, जो भारतीय दर्शन का एक विशिष्ट सिद्धांत है, देह-त्याग के बिना मुक्ति) की सबसे स्पष्ट परिभाषाओं में से एक है। कर्तृत्व का भाव इतना पूर्णतः विसर्जित हो जाता है कि जीवन मानो स्वयं ही, बिना किसी कर्ता के, अपनी गति से चलता रहता है।

श्लोक १८.१४

मूल श्लोक (संस्कृत)

क्व मोहः क्व च वा विश्वं क्व तद् ध्यानं क्व मुक्तता । सर्वसङ्कल्पसीमायां विश्रान्तस्य महात्मनः ॥ १८-१४॥

भावार्थ

महान आत्मा के लिए, जो इच्छा से परे रहता है, भ्रम कहाँ है? जगत कहाँ है? "उस पर ध्यान" कहाँ है? उससे मुक्ति भी कहाँ है?
श्लोक १८.१५

मूल श्लोक (संस्कृत)

येन विश्वमिदं दृष्टं स नास्तीति करोतु वै । निर्वासनः किं कुरुते पश्यन्नपि न पश्यति ॥ १८-१५॥

भावार्थ

जो जगत को देखता है वह उसे त्यागने का प्रयास कर सकता है। पर इच्छारहित व्यक्ति क्या कर सकता है? वह देखता है कि देखने के लिए कुछ भी नहीं है।
श्लोक १८.१६

मूल श्लोक (संस्कृत)

येन दृष्टं परं ब्रह्म सोऽहं ब्रह्मेति चिन्तयेत् । किं चिन्तयति निश्चिन्तो द्वितीयं यो न पश्यति ॥ १८-१६॥

भावार्थ

जिसने परम ब्रह्म को देखा है, वह सोचता है, "मैं ब्रह्म हूँ।" पर जो समस्त विचार से परे चला गया है, वह क्या सोच सकता है? वह स्वयं के अतिरिक्त कुछ और नहीं जानता।

यह श्लोक साधना-मार्ग की एक सूक्ष्म सीढ़ी को उजागर करता है — "मैं ब्रह्म हूँ" (अहम् ब्रह्मास्मि) यह घोषणा एक शक्तिशाली, महत्वपूर्ण चरण है, पर यह भी अंततः एक विचार है, "मैं" और "ब्रह्म" के बीच एक कथन-सम्बन्ध। जो पूर्णतः पार हो चुका है, उसके लिए यहाँ तक कि यह घोषणा भी अनावश्यक हो जाती है, क्योंकि सोचने वाला ही शेष नहीं रहता।

श्लोक १८.१७

मूल श्लोक (संस्कृत)

दृष्टो येनात्मविक्षेपो निरोधं कुरुते त्वसौ । उदारस्तु न विक्षिप्तः साध्याभावात्करोति किम् ॥ १८-१७॥

भावार्थ

वह आत्म-नियंत्रण प्राप्त करता है जो अपनी स्वयं की विचलितता देखता है। पर महान आत्मा विचलित नहीं होती। उसे कुछ प्राप्त करना शेष नहीं। उसे कुछ करना शेष नहीं।
श्लोक १८.१८

मूल श्लोक (संस्कृत)

धीरो लोकविपर्यस्तो वर्तमानोऽपि लोकवत् । न समाधिं न विक्षेपं न लोपं स्वस्य पश्यति ॥ १८-१८॥

भावार्थ

ज्ञानी सामान्य मनुष्य की भाँति जीवन जी सकता है, पर वह वैसा नहीं है। वह देखता है कि वह न केन्द्रित है, न विचलित, और स्वयं में कोई दोष नहीं पाता।
श्लोक १८.१९

मूल श्लोक (संस्कृत)

भावाभावविहीनो यस्तृप्तो निर्वासनो बुधः । नैव किञ्चित्कृतं तेन लोकदृष्ट्या विकुर्वता ॥ १८-१९॥

भावार्थ

जो अस्तित्व और अनस्तित्व से परे है — जो बुद्धिमान, संतुष्ट, इच्छा-रहित है — कुछ भी नहीं करता, यद्यपि जगत उसे गतिशील देख सकता है।
श्लोक १८.२०

मूल श्लोक (संस्कृत)

प्रवृत्तौ वा निवृत्तौ वा नैव धीरस्य दुर्ग्रहः । यदा यत्कर्तुमायाति तत्कृत्वा तिष्ठतः सुखम् ॥ १८-२०॥

भावार्थ

बुद्धिमान व्यक्ति कर्म या निष्क्रियता से विचलित नहीं होता। वह प्रसन्नतापूर्वक जीता है, जो कुछ भी घटित होता है वही करते हुए।
श्लोक १८.२१

मूल श्लोक (संस्कृत)

निर्वासनो निरालम्बः स्वच्छन्दो मुक्तबन्धनः । क्षिप्तः संस्कारवातेन चेष्टते शुष्कपर्णवत् ॥ १८-२१॥

भावार्थ

हवा में पत्ते की भाँति, मुक्त आत्मा जीवन से असंलग्न है — इच्छारहित, स्वतंत्र, मुक्त।

यह श्लोक इस अध्याय के प्रथम भाग की सबसे काव्यात्मक उपमाओं में से एक है — "हवा में पत्ते की भाँति।" पत्ता हवा के प्रवाह के साथ इधर-उधर उड़ता है, बिना किसी प्रतिरोध के, बिना यह चुनने की चेष्टा के कि वह कहाँ जाएगा — फिर भी वह पूर्णतः स्वतंत्र प्रतीत होता है, क्योंकि उसमें किसी दिशा को पकड़ने या रोकने का कोई आग्रह नहीं। यही असंलग्नता (untetheredness) मुक्त आत्मा की स्वतंत्रता का सटीक चित्रण है।

श्लोक १८.२२

मूल श्लोक (संस्कृत)

असंसारस्य तु क्वापि न हर्षो न विषादता । स शीतलमना नित्यं विदेह इव राजये ॥ १८-२२॥

भावार्थ

जिसने जगत को पार कर लिया है, उसके लिए न हर्ष है, न शोक। स्थिर मन के साथ, वह बिना देह के ही जीता रहता है।

"बिना देह के ही जीता रहता है" यह विरोधाभासी वाक्यांश देह के भौतिक अस्तित्व को नकारता नहीं, बल्कि देह के साथ मानसिक पहचान की पूर्ण अनुपस्थिति को इंगित करता है — देह तो है, पर उसे "मैं" के रूप में जीना अब नहीं है।

श्लोक १८.२३

मूल श्लोक (संस्कृत)

कुत्रापि न जिहासास्ति नाशो वापि न कुत्रचित् । आत्मारामस्य धीरस्य शीतलाच्छतरात्मनः ॥ १८-२३॥

भावार्थ

स्वयं को जानने वाला, जिसका मन शान्त और निर्दोष है, किसी वस्तु को त्यागने की इच्छा नहीं रखता, न ही उसे तरसता है जो नहीं है।
श्लोक १८.२४

मूल श्लोक (संस्कृत)

प्रकृत्या शून्यचित्तस्य कुर्वतोऽस्य यदृच्छया । प्राकृतस्येव धीरस्य न मानो नावमानता ॥ १८-२४॥

भावार्थ

उसका मन स्वाभाविक रूप से रिक्त होने की स्थिति में है, बुद्धिमान व्यक्ति सम्मान और अपमान से कुछ भी नहीं जानता। वह वही करता है जो सामने आता है।
श्लोक १८.२५

मूल श्लोक (संस्कृत)

कृतं देहेन कर्मेदं न मया शुद्धरूपिणा । इति चिन्तानुरोधी यः कुर्वन्नपि करोति न ॥ १८-२५॥

भावार्थ

"यह देह द्वारा किया जाता है, मेरे द्वारा नहीं, जो शुद्ध आत्मा हूँ" — यह जानकर कर्म करने वाला वस्तुतः कुछ भी नहीं करता — चाहे कितना भी कर्म क्यों न हो रहा हो।

इस पहले भाग के अंतिम श्लोक में एक महत्वपूर्ण सूत्र दिया गया है, जो अध्याय के आगे के भागों में भी बार-बार लौटेगा — कर्तृत्व का त्याग किसी कर्म-त्याग से नहीं होता, बल्कि इस बोध से होता है कि कर्म देह-मन की प्रणाली द्वारा किया जा रहा है, न कि उस शुद्ध साक्षी-आत्मा द्वारा जो "मैं" वास्तव में है। यह भेद इतना सूक्ष्म और शक्तिशाली है कि यह बाहरी रूप से पूर्ण सक्रिय जीवन को भी भीतर से पूर्ण अकर्तृत्व में बदल देता है।

अध्याय १८ का यह पहला भाग यहीं समाप्त होता है। अगले भाग (श्लोक २६-५०) में अष्टावक्र ज्ञानी की निष्कपटता, "आश्चर्यम्" के प्रसिद्ध श्लोक-समूह, और अज्ञानी बनाम ज्ञानी की तुलना पर विशेष रूप से केन्द्रित होंगे। तैयार हों तो बताइए। -e

भूमिका

पहले भाग में अष्टावक्र ने कर्तृत्व-हीनता, इच्छा-रहित जीवन और असंलग्नता के सिद्धांतों को स्थापित किया। इस दूसरे भाग में वे उन विशिष्ट अन्तरों की ओर मुड़ते हैं जो ज्ञानी और अज्ञानी के बीच हैं — यहाँ थकान, प्रयास, शांति और अशांति के तुलनात्मक चित्रण अधिक हैं। यह भाग विशेष रूप से व्यावहारिक है, क्योंकि यह ज्ञानी की आन्तरिक अवस्था को अज्ञानी की आन्तरिक अवस्था के सीधे विरोधाभास में प्रस्तुत करता है, जिससे साधक अपनी स्थिति को परख सके।

श्लोक १८.२६

मूल श्लोक (संस्कृत)

अतद्वादीव कुरुते न भवेदपि बालिशः । जीवन्मुक्तः सुखी श्रीमान् संसरन्नपि शोभते ॥ १८-२६॥

भावार्थ

मुक्त आत्मा कर्म करता है, "मैं कर रहा हूँ" यह दावा किए बिना, पर वह मूर्ख नहीं है। वह धन्य और प्रसन्न है, चाहे जगत में क्यों न हो।
श्लोक १८.२७

मूल श्लोक (संस्कृत)

नानाविचारसुश्रान्तो धीरो विश्रान्तिमागतः । न कल्पते न जानाति न श‍ृणोति न पश्यति ॥ १८-२७॥

भावार्थ

मन की अंतहीन गतिविधियों से पर्याप्त परेशान होकर, बुद्धिमान व्यक्ति विश्राम पाता है। वह न सोचता है, न जानता है, न सुनता है, न देखता है।

"पर्याप्त परेशान होकर" यह वाक्यांश दर्शाता है कि विश्राम कोई सैद्धांतिक निष्कर्ष नहीं, बल्कि एक स्वाभाविक थकान का परिणाम है — जैसे बहुत देर तक दौड़ने के बाद शरीर स्वतः विश्राम माँगता है, वैसे ही मन की अनवरत गतिविधि के प्रति गहरी थकान अंततः एक स्वाभाविक विराम की ओर ले जाती है।

श्लोक १८.२८

मूल श्लोक (संस्कृत)

असमाधेरविक्षेपान् न मुमुक्षुर्न चेतरः । निश्चित्य कल्पितं पश्यन् ब्रह्मैवास्ते महाशयः ॥ १८-२८॥

भावार्थ

स्थिरता से परे, विक्षेप से परे, महान आत्मा मुक्ति या बंधन के बारे में कुछ नहीं सोचती। सृष्टि को शून्य देखकर — यद्यपि वह अस्तित्व में प्रतीत होती है — वह ईश्वर है।

"वह ईश्वर है" (he is God) यह अत्यंत साहसिक घोषणा है — यह किसी विशेष दैवी शक्ति की बात नहीं करता, बल्कि यह घोषित करता है कि जो व्यक्ति सृष्टि की शून्यता को पूर्णतः देख चुका है, वह उसी तत्त्व के साथ अभिन्न है जिसे सामान्यतः "ईश्वर" कहा जाता है — यह अद्वैत की चरम अभिव्यक्तियों में से एक है।

श्लोक १८.२९

मूल श्लोक (संस्कृत)

यस्यान्तः स्यादहङ्कारो न करोति करोति सः । निरहङ्कारधीरेण न किञ्चिदकृतं कृतम् ॥ १८-२९॥

भावार्थ

जो व्यक्ति स्वयं को व्यक्ति मानता है, वह निरन्तर कर्मरत है, चाहे देह विश्राम में ही क्यों न हो। ज्ञानी जानता है कि वह व्यक्ति नहीं, और इसलिए कुछ भी नहीं करता, चाहे देह गति में ही क्यों न हो।

यह श्लोक एक सुन्दर विरोधाभास प्रस्तुत करता है — देह की गति और मानसिक कर्तृत्व दो पृथक बातें हैं। अज्ञानी विश्राम की अवस्था में भी मानसिक रूप से सक्रिय है (चिंता, योजना, स्मृति में उलझा), जबकि ज्ञानी शारीरिक गतिविधि के बीच भी मानसिक रूप से पूर्णतः शान्त है।

श्लोक १८.३०

मूल श्लोक (संस्कृत)

नोद्विग्नं न च सन्तुष्टमकर्तृ स्पन्दवर्जितम् । निराशं गतसन्देहं चित्तं मुक्तस्य राजते ॥ १८-३०॥

भावार्थ

मुक्त आत्मा का मन न व्याकुल है, न प्रसन्न। यह निष्क्रिय, गतिहीन, इच्छारहित और संदेह-मुक्त है।
श्लोक १८.३१

मूल श्लोक (संस्कृत)

निर्ध्यातुं चेष्टितुं वापि यच्चित्तं न प्रवर्तते । निर्निमित्तमिदं किन्तु निर्ध्यायेति विचेष्टते ॥ १८-३१॥

भावार्थ

मुक्त आत्मा ध्यान या कर्म करने के लिए प्रयास नहीं करती। क्रिया और ध्यान बस घटित होते रहते हैं।
श्लोक १८.३२

मूल श्लोक (संस्कृत)

तत्त्वं यथार्थमाकर्ण्य मन्दः प्राप्नोति मूढताम् । अथवा याति सङ्कोचममूढः कोऽपि मूढवत् ॥ १८-३२॥

भावार्थ

सत्य सुनकर, मंदबुद्धि व्यक्ति भ्रमित हो जाता है। बुद्धिमान व्यक्ति सत्य सुनकर भीतर की ओर लौट जाता है और मंदबुद्धि जैसा प्रतीत होता है।

यह श्लोक विशेष रूप से रोचक है क्योंकि यह ज्ञानी और अज्ञानी की बाहरी समानता की ओर इशारा करता है — दोनों ही परम सत्य सुनकर बाहर से "मंद" या "स्तब्ध" प्रतीत हो सकते हैं, पर उनकी आन्तरिक अवस्था पूर्णतः भिन्न है। मूढ़ व्यक्ति की स्तब्धता भ्रम से आती है, जबकि ज्ञानी की स्तब्धता गहन आन्तरिक शांति से — यह बाहरी अवलोकन से पहचानना कठिन बनाता है कि कौन वास्तव में क्या अनुभव कर रहा है।

श्लोक १८.३३

मूल श्लोक (संस्कृत)

एकाग्रता निरोधो वा मूढैरभ्यस्यते भृशम् । धीराः कृत्यं न पश्यन्ति सुप्तवत्स्वपदे स्थिताः ॥ १८-३३॥

भावार्थ

अज्ञानी ध्यान और अ-विचार का अभ्यास करते हैं। ज्ञानी, गहरी नींद में डूबे व्यक्तियों की भाँति, कुछ भी नहीं करते।
श्लोक १८.३४

मूल श्लोक (संस्कृत)

अप्रयत्नात् प्रयत्नाद् वा मूढो नाप्नोति निर्वृतिम् । तत्त्वनिश्चयमात्रेण प्राज्ञो भवति निर्वृतः ॥ १८-३४॥

भावार्थ

अज्ञानी न प्रयास से शांति पाता है, न अ-प्रयास से। ज्ञानी सत्य द्वारा ही स्थिर होता है।
श्लोक १८.३५

मूल श्लोक (संस्कृत)

शुद्धं बुद्धं प्रियं पूर्णं निष्प्रपञ्चं निरामयम् । आत्मानं तं न जानन्ति तत्राभ्यासपरा जनाः ॥ १८-३५॥

भावार्थ

यद्यपि वे स्वभाव से केवल आत्मा हैं, शुद्ध बुद्धि, प्रेम और पूर्णता; यद्यपि वे सृष्टि से परे हैं और स्पष्टता स्वयं हैं, संसार के मनुष्य ध्यान और अभ्यास के माध्यम से इसे नहीं देखते।
श्लोक १८.३६

मूल श्लोक (संस्कृत)

नाप्नोति कर्मणा मोक्षं विमूढोऽभ्यासरूपिणा । धन्यो विज्ञानमात्रेण मुक्तस्तिष्ठत्यविक्रियः ॥ १८-३६॥

भावार्थ

अज्ञानी अपने दोहराव भरे अभ्यासों से कभी मुक्त नहीं होगा। धन्य है वह जो सरल समझ के द्वारा कालातीत स्वतंत्रता में प्रवेश करता है।

यह अध्याय १६ के "पका हुआ मन एक उपदेश सुनकर मुक्त हो सकता है" की भावना को दोहराता है — यह "सरल समझ" (simple understanding) की शक्ति का उद्घोष है, जो जटिल, दोहराव भरे अभ्यासों की तुलना में अधिक प्रभावी सिद्ध हो सकती है।

श्लोक १८.३७

मूल श्लोक (संस्कृत)

मूढो नाप्नोति तद् ब्रह्म यतो भवितुमिच्छति । अनिच्छन्नपि धीरो हि परब्रह्मस्वरूपभाक् ॥ १८-३७॥

भावार्थ

क्योंकि वह ईश्वर को जानना चाहता है, अज्ञानी कभी वह नहीं बन सकता। ज्ञानी ईश्वर है क्योंकि वह इच्छा से मुक्त है और कुछ भी नहीं जानता।
श्लोक १८.३८

मूल श्लोक (संस्कृत)

निराधारा ग्रहव्यग्रा मूढाः संसारपोषकाः । एतस्यानर्थमूलस्य मूलच्छेदः कृतो बुधैः ॥ १८-३८॥

भावार्थ

स्थिर खड़े रहने में असमर्थ और मुक्ति के लिए उत्सुक, अज्ञानी जगत के भ्रम को बनाए रखते हैं। जगत को समस्त दुःख का स्रोत देखकर, ज्ञानी इसे जड़ से काट देते हैं।
श्लोक १८.३९

मूल श्लोक (संस्कृत)

न शान्तिं लभते मूढो यतः शमितुमिच्छति । धीरस्तत्त्वं विनिश्चित्य सर्वदा शान्तमानसः ॥ १८-३९॥

भावार्थ

मूर्ख सोचता है कि मन को नियंत्रित करने से शांति आती है। वह उसे कभी प्राप्त नहीं करेगा। ज्ञानी सत्य जानता है, और वह स्थिरता स्वयं है।
श्लोक १८.४०

मूल श्लोक (संस्कृत)

क्वात्मनो दर्शनं तस्य यद् दृष्टमवलम्बते । धीरास्तं तं न पश्यन्ति पश्यन्त्यात्मानमव्ययम् ॥ १८-४०॥

भावार्थ

जो व्यक्ति ज्ञान को वस्तुओं और विचारों के रूप में मानता है, उसके लिए आत्म-ज्ञान कैसे हो सकता है? ज्ञानी पृथक वस्तुएँ नहीं देखते — केवल कालातीत आत्मा।
श्लोक १८.४१

मूल श्लोक (संस्कृत)

क्व निरोधो विमूढस्य यो निर्बन्धं करोति वै । स्वारामस्यैव धीरस्य सर्वदासावकृत्रिमः ॥ १८-४१॥

भावार्थ

मूर्ख मन को मन से नियंत्रित करने का प्रयास करता है — कैसी मूर्खता! ज्ञानी केवल आत्मा में आनन्दित होता है। वहाँ नियंत्रित करने के लिए कोई मन नहीं।

यह श्लोक अध्याय १६ के "मन को शांत करने का प्रयास ही एक नया बंधन है" की गहरी पुष्टि करता है — मन के द्वारा मन को नियंत्रित करने का प्रयास तार्किक रूप से भी असम्भव है, क्योंकि नियंत्रक और नियंत्रित दोनों एक ही मन की उपज हैं।

श्लोक १८.४२

मूल श्लोक (संस्कृत)

भावस्य भावकः कश्चिन् न किञ्चिद् भावकोपरः । उभयाभावकः कश्चिद् एवमेव निराकुलः ॥ १८-४२॥

भावार्थ

कुछ अस्तित्व में विश्वास करते हैं; अन्य मानते हैं कुछ भी अस्तित्व में नहीं है। दुर्लभ है वह जो कुछ भी नहीं मानता और कभी भ्रमित नहीं होता।
श्लोक १८.४३

मूल श्लोक (संस्कृत)

शुद्धमद्वयमात्मानं भावयन्ति कुबुद्धयः । न तु जानन्ति संमोहाद्यावज्जीवमनिर्वृताः ॥ १८-४३॥

भावार्थ

दुर्बल बुद्धिजीवी विश्वास कर सकते हैं कि आत्मा एक है, अन्य से रहित। पर भ्रम में उलझे हुए, वे वास्तव में आत्मा को नहीं जानते, इसलिए दुःख में जीवन बिताते हैं।

यह श्लोक बौद्धिक स्वीकृति और वास्तविक अनुभव के बीच के अंतर को फिर से रेखांकित करता है — यहाँ तक कि अद्वैत के सही सिद्धांत को बौद्धिक रूप से मान लेना भी पर्याप्त नहीं यदि वह जीवंत अनुभव में परिणत नहीं हुआ।

श्लोक १८.४४

मूल श्लोक (संस्कृत)

मुमुक्षोर्बुद्धिरालम्बमन्तरेण न विद्यते । निरालम्बैव निष्कामा बुद्धिर्मुक्तस्य सर्वदा ॥ १८-४४॥

भावार्थ

मुक्ति चाहने वाले का मन बोध के लिए वस्तुओं पर निर्भर करता है। मुक्त आत्मा का मन कुछ भी नहीं देखता और इच्छा से मुक्त है।
श्लोक १८.४५

मूल श्लोक (संस्कृत)

विषयद्वीपिनो वीक्ष्य चकिताः शरणार्थिनः । विशन्ति झटिति क्रोडं निरोधैकाग्रसिद्धये ॥ १८-४५॥

भावार्थ

भयभीत व्यक्ति इन्द्रिय-अनुभव से वैसे ही डरते हैं जैसे बाघों से। वे गुफाओं में शरण लेते हैं और जगत को "अन-विचारने" का प्रयास करते हैं।
श्लोक १८.४६

मूल श्लोक (संस्कृत)

निर्वासनं हरिं दृष्ट्वा तूष्णीं विषयदन्तिनः । पलायन्ते न शक्तास्ते सेवन्ते कृतचाटवः ॥ १८-४६॥

भावार्थ

इन्द्रिय-अनुभव हाथियों की भाँति हैं जो, इच्छारहित व्यक्ति से मिलकर, उसे सिंह के रूप में देखते हैं। वे तुरन्त पलायन कर जाते हैं, या यदि पलायन नहीं कर सकते, तो उसकी सेवा और चापलूसी में लग जाते हैं।

यह श्लोक विशेष रूप से रोचक और प्रतीकात्मक है — साधारणतः यह माना जाता है कि इन्द्रिय-अनुभव मनुष्य को नियंत्रित करते हैं, उसे अपनी दिशा में खींचते हैं। पर यहाँ यह सम्बन्ध उलट जाता है — जब कोई व्यक्ति सचमुच इच्छा-रहित हो जाता है, तो इन्द्रिय-अनुभव उसे "सिंह" (नियंत्रक) के रूप में देखते हैं और भाग जाते हैं या उसकी सेवा में आ जाते हैं, बजाय इसके कि वे उसे नियंत्रित करें — यह शक्ति-सम्बन्ध का पूर्ण उलटाव इच्छा-रहितता की आंतरिक शक्ति को दर्शाता है।

श्लोक १८.४७

मूल श्लोक (संस्कृत)

न मुक्तिकारिकां धत्ते निःशङ्को युक्तमानसः । पश्यन् श‍ृण्वन् स्पृशन् जिघ्रन्नश्नन्नास्ते यथासुखम् ॥ १८-४७॥

भावार्थ

जिसे कोई संदेह नहीं, जो केवल आत्मा को जानता है, उसे अभ्यास या मुक्ति की आवश्यकता नहीं। देखते, सुनते, स्पर्श करते, सूँघते, खाते हुए — वह जैसा है वैसा ही जीता है, प्रसन्नतापूर्वक।
श्लोक १८.४८

मूल श्लोक (संस्कृत)

वस्तुश्रवणमात्रेण शुद्धबुद्धिर्निराकुलः । नैवाचारमनाचारमौदास्यं वा प्रपश्यति ॥ १८-४८॥

भावार्थ

जिसका मन सत्य सुनने मात्र से खाली और अद्वंद्व हो गया है, उसे न कुछ करने योग्य दिखता है, न बचने योग्य, न ही अपनी उदासीनता के लिए कोई औचित्य चाहिए।
श्लोक १८.४९

मूल श्लोक (संस्कृत)

यदा यत्कर्तुमायाति तदा तत्कुरुते ऋजुः । शुभं वाप्यशुभं वापि तस्य चेष्टा हि बालवत् ॥ १८-४९॥

भावार्थ

साधु जो कुछ भी सामने आता है वही करता है, बिना अच्छे-बुरे के विचार के। उसके कर्म बालक के कर्मों के समान हैं।
श्लोक १८.५०

मूल श्लोक (संस्कृत)

स्वातन्त्र्यात्सुखमाप्नोति स्वातन्त्र्याल्लभते परम् । स्वातन्त्र्यान्निर्वृतिं गच्छेत्स्वातन्त्र्यात् परमं पदम् ॥ १८-५०॥

भावार्थ

कुछ भी पर निर्भर न होकर, व्यक्ति प्रसन्नता पाता है। कुछ भी पर निर्भर न होकर, व्यक्ति परम तत्त्व को प्राप्त करता है। कुछ भी पर निर्भर न होकर, व्यक्ति शांति से गुज़रकर एक आत्मा तक पहुँचता है।

यह श्लोक इस दूसरे भाग का समापन एक त्रि-आवृत्ति सूत्र से करता है — "कुछ भी पर निर्भर न होकर" यह वाक्यांश तीन बार दोहराया जाता है, प्रसन्नता, परम तत्त्व, और अंतिम एकत्व की ओर तीन अलग-अलग परिणामों को इंगित करते हुए। यह दोहराव इस अध्याय के भीतर एक विराम-बिन्दु की भाँति कार्य करता है, मानो एक लम्बी यात्रा के मध्य में एक गहरी साँस।

अध्याय १८ का यह दूसरा भाग यहीं समाप्त होता है। तीसरे भाग (श्लोक ५१-७५) में अष्टावक्र कर्तृत्व-हीनता, पाखंड-रहित आचरण, और सांसारिक जीवन के भीतर रहते हुए भी पूर्ण असंगता के विस्तृत चित्रण की ओर बढ़ेंगे। तैयार हों तो बताइए। -e

भूमिका

दूसरे भाग में अष्टावक्र ने ज्ञानी और अज्ञानी की आन्तरिक अवस्थाओं का विस्तृत तुलनात्मक चित्रण किया। इस तीसरे भाग में वे कर्तृत्व-हीनता, निष्कपट आचरण, और सांसारिक जीवन के मध्य पूर्ण असंगता के विषय में और गहराई से उतरते हैं। यह भाग विशेष रूप से व्यावहारिक जीवन-स्थितियों — सम्बन्ध, अपमान, दैनिक क्रियाएँ — पर केन्द्रित है, यह दिखाते हुए कि ज्ञान किस प्रकार जीवन के सामान्यतम क्षणों में भी प्रकट होता है।

श्लोक १८.५१

मूल श्लोक (संस्कृत)

अकर्तृत्वमभोक्तृत्वं स्वात्मनो मन्यते यदा । तदा क्षीणा भवन्त्येव समस्ताश्चित्तवृत्तयः ॥ १८-५१॥

भावार्थ

जब कोई यह अनुभव करता है कि वह न कर्ता है, न देखने वाला, तब मन-तूफान शान्त हो जाता है।

"मन-तूफान" (mind-storm) यह उपमा शक्तिशाली है — मन की गतिविधियाँ, विचार, चिंताएँ एक तूफान की भाँति उठती हैं, प्रबल और अनियंत्रित प्रतीत होती हैं। पर जिस क्षण कर्तृत्व और द्रष्टृत्व दोनों का भाव विसर्जित होता है, वह तूफान अपने आप शांत हो जाता है — जैसे तूफान का ईंधन ही समाप्त हो गया हो।

श्लोक १८.५२

मूल श्लोक (संस्कृत)

उच्छृङ्खलाप्यकृतिका स्थितिर्धीरस्य राजते । न तु सस्पृहचित्तस्य शान्तिर्मूढस्य कृत्रिमा ॥ १८-५२॥

भावार्थ

ज्ञानी के कर्म, आडम्बर और उद्देश्य से मुक्त, स्वच्छ प्रकाश की भाँति चमकते हैं। भ्रमित साधक के कर्म ऐसे नहीं होते, जो शांत भाव धारण किए रहता है जबकि दृढ़ता से आसक्त बना रहता है।

यह श्लोक ज्ञानी और दिखावटी साधक के बीच एक तीखा भेद खींचता है — बाहरी शांत मुद्रा धारण करना पर्याप्त नहीं यदि भीतर आसक्ति दृढ़ता से बनी हुई है। यह पाखंड के प्रति एक स्पष्ट चेतावनी है, जो आध्यात्मिक साधकों के बीच एक सामान्य खतरा है — शांति का अभिनय करना, वास्तविक शांति के बिना।

श्लोक १८.५३

मूल श्लोक (संस्कृत)

विलसन्ति महाभोगैर्विशन्ति गिरिगह्वरान् । निरस्तकल्पना धीरा अबद्धा मुक्तबुद्धयः ॥ १८-५३॥

भावार्थ

असीमित, बंधन-मुक्त, मन के प्रक्षेपणों से मुक्त होकर, बुद्धिमान लोग खेलने और आनन्द लेने के लिए स्वतंत्र हैं, या पर्वत-गुफाओं में सेवानिवृत्त होने के लिए।
श्लोक १८.५४

मूल श्लोक (संस्कृत)

श्रोत्रियं देवतां तीर्थमङ्गनां भूपतिं प्रियम् । दृष्ट्वा सम्पूज्य धीरस्य न कापि हृदि वासना ॥ १८-५४॥

भावार्थ

चाहे वह किसी आध्यात्मिक विद्वान, देवता, या पवित्र तीर्थ का सम्मान कर रहा हो; चाहे वह किसी सुन्दर स्त्री, राजा, या प्रिय मित्र को देख रहा हो — ज्ञानी का हृदय अविचल रहता है।
श्लोक १८.५५

मूल श्लोक (संस्कृत)

भृत्यैः पुत्रैः कलत्रैश्च दौहित्रैश्चापि गोत्रजैः । विहस्य धिक्कृतो योगी न याति विकृतिं मनाक् ॥ १८-५५॥

भावार्थ

यद्यपि उसके सेवक, पुत्र, पत्नियाँ, पुत्रियाँ और सम्पूर्ण सम्बन्धीजन उसे उपहास और तिरस्कार करें, योगी विचलित नहीं होता।

यह श्लोक विशेष रूप से मार्मिक है क्योंकि यह अत्यंत निकट सम्बन्धों — परिवार, अपने ही घर के लोगों — द्वारा उपहास का उल्लेख करता है, जो साधारण मनुष्य के लिए सर्वाधिक कष्टकारी अनुभव हो सकता है। यह दिखाता है कि ज्ञानी की स्थिरता किसी दूरस्थ, अमूर्त परिस्थिति में नहीं, बल्कि जीवन के सबसे निकटतम, सबसे भावनात्मक रूप से आवेशित सम्बन्धों में भी परखी जाती है।

श्लोक १८.५६

मूल श्लोक (संस्कृत)

सन्तुष्टोऽपि न सन्तुष्टः खिन्नोऽपि न च खिद्यते । तस्याश्चर्यदशां तां तां तादृशा एव जानते ॥ १८-५६॥

भावार्थ

यद्यपि प्रसन्न होता है, वह सुख से आसक्त नहीं होता; यद्यपि पीड़ित होता है, वह दुःखी नहीं होता। यह अद्भुत अवस्था केवल वैसे व्यक्तियों द्वारा ही समझी जा सकती है जो स्वयं भी वैसे हैं।
श्लोक १८.५७

मूल श्लोक (संस्कृत)

कर्तव्यतैव संसारो न तां पश्यन्ति सूरयः । शून्याकारा निराकारा निर्विकारा निरामयाः ॥ १८-५७॥

भावार्थ

कर्तव्य में विश्वास कर्तव्य-पालन के लिए एक सापेक्ष जगत बनाता है। ज्ञानी स्वयं को निराकार, कालातीत, सर्वव्यापी, निर्मल जानता है, और इस प्रकार कर्तव्य और जगत दोनों से परे चला जाता है।
श्लोक १८.५८

मूल श्लोक (संस्कृत)

अकुर्वन्नपि सङ्क्षोभाद् व्यग्रः सर्वत्र मूढधीः । कुर्वन्नपि तु कृत्यानि कुशलो हि निराकुलः ॥ १८-५८॥

भावार्थ

कुछ न करते हुए भी मंदबुद्धि व्यक्ति चिंतित और विचलित रहता है। महान कर्म के बीच भी ज्ञानी स्थिर रहता है।
श्लोक १८.५९

मूल श्लोक (संस्कृत)

सुखमास्ते सुखं शेते सुखमायाति याति च । सुखं वक्ति सुखं भुङ्क्ते व्यवहारेऽपि शान्तधीः ॥ १८-५९॥

भावार्थ

व्यावहारिक जीवन में भी ज्ञानी प्रसन्न रहता है। बैठना प्रसन्न, सोना प्रसन्न, घूमना प्रसन्न, बोलना प्रसन्न, खाना प्रसन्न...

यह श्लोक अपनी सूची-शैली में विशेष रूप से लयबद्ध और आनन्दमयी है, मानो हर सामान्य क्रिया में यह प्रसन्नता की धुन गूँज रही हो — इस पुनरावृत्ति में स्वयं एक ध्यानपूर्ण, लगभग गीत जैसा भाव है।

श्लोक १८.६०

मूल श्लोक (संस्कृत)

स्वभावाद्यस्य नैवार्तिर्लोकवद् व्यवहारिणः । महाह्रद इवाक्षोभ्यो गतक्लेशः सुशोभते ॥ १८-६०॥

भावार्थ

क्योंकि वह स्वयं को जानता है, ज्ञानी व्यावहारिक जीवन से विचलित नहीं होता। वह गहरा और स्थिर है, विशाल झील की भाँति। वह सामान्य लोगों जैसा नहीं। उसके दुःख समाप्त हो चुके हैं।

"विशाल झील" की उपमा सागर की उपमाओं से भिन्न है — झील अधिक शांत, अधिक स्थिर प्रतीत होती है, बिना ज्वार-भाटा के, और यह इस विशेष श्लोक के भाव के अनुकूल है, जो व्यावहारिक जीवन के भीतर की गहरी स्थिरता की बात करता है।

श्लोक १८.६१

मूल श्लोक (संस्कृत)

निवृत्तिरपि मूढस्य प्रवृत्ति रुपजायते । प्रवृत्तिरपि धीरस्य निवृत्तिफलभागिनी ॥ १८-६१॥

भावार्थ

भ्रमित व्यक्ति के लिए, विश्राम भी एक गतिविधि है। ज्ञानी के लिए, कर्म भी स्थिरता का फल लाता है।

यह विरोधाभासी श्लोक विशेष रूप से गहन है — यह इस पूरे अध्याय के केन्द्रीय विरोधाभास को संक्षेप में समेटता है: बाहरी क्रिया आन्तरिक अवस्था का सही मापदंड नहीं। भ्रमित व्यक्ति की "निष्क्रियता" भी मानसिक रूप से सक्रिय है (चिंता, बेचैनी), जबकि ज्ञानी की "सक्रियता" भी मानसिक रूप से पूर्ण विश्राम में है।

श्लोक १८.६२

मूल श्लोक (संस्कृत)

परिग्रहेषु वैराग्यं प्रायो मूढस्य दृश्यते । देहे विगलिताशस्य क्व रागः क्व विरागता ॥ १८-६२॥

भावार्थ

भ्रमित व्यक्ति प्रायः अपने ही जीवन की वस्तुओं के प्रति विमुख रहता है। देह के प्रति निश्चिन्त व्यक्ति के लिए, आसक्ति और विरक्ति का कोई अर्थ नहीं रहता।
श्लोक १८.६३

मूल श्लोक (संस्कृत)

भावनाभावनासक्ता दृष्टिर्मूढस्य सर्वदा । भाव्यभावनया सा तु स्वस्थस्यादृष्टिरूपिणी ॥ १८-६३॥

भावार्थ

भ्रमित मन सोचने और न सोचने में उलझा रहता है। यद्यपि ज्ञानी का मन जो विचार आएँ उन्हें सोच सकता है, वह उससे अनजान रहता है।

यह अंतिम पंक्ति विशेष रूप से सूक्ष्म है — "वह उससे अनजान रहता है" (he is not aware of it)। इसका अर्थ यह नहीं कि ज्ञानी में चेतना का अभाव है, बल्कि यह कि उसका विचार-प्रवाह अब किसी "मैं यह सोच रहा हूँ" इस पहचान से जुड़ा नहीं — विचार आते-जाते रहते हैं, बिना किसी मालिक के, बिना किसी "विचारक" की भावना के।

श्लोक १८.६४

मूल श्लोक (संस्कृत)

सर्वारम्भेषु निष्कामो यश्चरेद् बालवन् मुनिः । न लेपस्तस्य शुद्धस्य क्रियमाणेऽपि कर्मणि ॥ १८-६४॥

भावार्थ

साधु देखता है कि कुछ भी नहीं किया जा रहा, यहाँ तक कि जब वह अपने हाथों से कर्म कर रहा हो। बालक की भाँति वह शुद्ध है और बिना किसी कारण के कार्य करता है।
श्लोक १८.६५

मूल श्लोक (संस्कृत)

स एव धन्य आत्मज्ञः सर्वभावेषु यः समः । पश्यन् श‍ृण्वन् स्पृशन् जिघ्रन्न् अश्नन्निस्तर्षमानसः ॥ १८-६५॥

भावार्थ

धन्य है वह जो स्वयं को जानता है। यद्यपि वह देखता, सुनता, छूता, सूँघता, खाता है, वह कभी इच्छा नहीं करता, न बदलता है।
श्लोक १८.६६

मूल श्लोक (संस्कृत)

क्व संसारः क्व चाभासः क्व साध्यं क्व च साधनम् । आकाशस्येव धीरस्य निर्विकल्पस्य सर्वदा ॥ १८-६६॥

भावार्थ

जो शून्य और अपरिवर्तनशील है, उसके लिए जगत और उसकी कल्पनाएँ कहाँ हैं? अन्त कहाँ है? इसकी सम्भावना भी कहाँ है?
श्लोक १८.६७

मूल श्लोक (संस्कृत)

स जयत्यर्थसंन्यासी पूर्णस्वरसविग्रहः । अकृत्रिमोऽनवच्छिन्ने समाधिर्यस्य वर्तते ॥ १८-६७॥

भावार्थ

गौरवशाली है वह जो, इच्छा से मुक्त, आनन्द स्वरूप हो चुका है। वह स्वयं में लीन हो चुका है।
श्लोक १८.६८

मूल श्लोक (संस्कृत)

बहुनात्र किमुक्तेन ज्ञाततत्त्वो महाशयः । भोगमोक्षनिराकाङ्क्षी सदा सर्वत्र नीरसः ॥ १८-६८॥

भावार्थ

संक्षेप में, वह महान आत्मा जिसने सत्य का साक्षात्कार किया है, इच्छा, भोग और मुक्ति से मुक्त है। सम्पूर्ण स्थान और काल में वह किसी वस्तु से आसक्त नहीं।
श्लोक १८.६९

मूल श्लोक (संस्कृत)

महदादि जगद्द्वैतं नाममात्रविजृम्भितम् । विहाय शुद्धबोधस्य किं कृत्यमवशिष्यते ॥ १८-६९॥

भावार्थ

उस एक के लिए क्या शेष रहता है जो स्वयं चैतन्य है, जो एक नाम के मात्र विचार से निर्मित भौतिक जगत के अनस्तित्व को देखता है?
श्लोक १८.७०

मूल श्लोक (संस्कृत)

भ्रमभूतमिदं सर्वं किञ्चिन्नास्तीति निश्चयी । अलक्ष्यस्फुरणः शुद्धः स्वभावेनैव शाम्यति ॥ १८-७०॥

भावार्थ

शांति उसके लिए स्वाभाविक है जो निश्चय जानता है कि कुछ भी अस्तित्व में नहीं, जो देखता है कि प्रतीतियाँ भ्रम हैं, जिसके लिए अवर्णनीय स्पष्ट है।
श्लोक १८.७१

मूल श्लोक (संस्कृत)

शुद्धस्फुरणरूपस्य दृश्यभावमपश्यतः । क्व विधिः क्व च वैराग्यं क्व त्यागः क्व शमोऽपि वा ॥ १८-७१॥

भावार्थ

आचरण के नियम, विरक्ति, त्याग, तपस्या — इनका क्या अर्थ है उसके लिए जो वस्तुओं की अवास्तविकता देखता है, जो चैतन्य का प्रकाश है?
श्लोक १८.७२

मूल श्लोक (संस्कृत)

स्फुरतोऽनन्तरूपेण प्रकृतिं च न पश्यतः । क्व बन्धः क्व च वा मोक्षः क्व हर्षः क्व विषादिता ॥ १८-७२॥

भावार्थ

अस्तित्व के अभाव को देखने वाले और अनन्त को प्रकाशित करने वाले के लिए हर्ष या शोक, बंधन या मुक्ति कैसे हो सकते हैं?
श्लोक १८.७३

मूल श्लोक (संस्कृत)

बुद्धिपर्यन्तसंसारे मायामात्रं विवर्तते । निर्ममो निरहङ्कारो निष्कामः शोभते बुधः ॥ १८-७३॥

भावार्थ

आत्म-साक्षात्कार तक, भ्रम व्याप्त रहता है। साधु "मैं" या "मेरे" के विचारों के बिना जीता है। भ्रम से उसका सम्बन्ध कट चुका है।
श्लोक १८.७४

मूल श्लोक (संस्कृत)

अक्षयं गतसन्तापमात्मानं पश्यतो मुनेः । क्व विद्या च क्व वा विश्वं क्व देहोऽहं ममेति वा ॥ १८-७४॥

भावार्थ

ज्ञान क्या है? जगत क्या है? "मैं देह हूँ," या "देह मेरी है" जैसे विचार क्या हैं? साधु अविनाशी और शोक-रहित है। वह स्वयं आत्मा है।
श्लोक १८.७५

मूल श्लोक (संस्कृत)

निरोधादीनि कर्माणि जहाति जडधीर्यदि । मनोरथान् प्रलापांश्च कर्तुमाप्नोत्यतत्क्षणात् ॥ १८-७५॥

भावार्थ

जब एक दुर्बल व्यक्ति ध्यान छोड़ देता है, वह सनक और इच्छाओं का शिकार बन जाता है।

इस भाग के अंतिम श्लोक में एक व्यावहारिक चेतावनी दी गई है — यह पूरा अध्याय जो साधना की सीमाओं की बात करता रहा है, उसके साथ यह श्लोक एक संतुलन बनाता है, यह याद दिलाते हुए कि जब तक पूर्ण स्थिरता नहीं आई है, तब तक अनुशासन और अभ्यास का त्याग करना दुर्बल व्यक्ति के लिए हानिकारक हो सकता है। यह गीता की एक विनम्र स्वीकृति है कि परम सत्य अलग-अलग साधकों के लिए अलग-अलग स्तर पर लागू होता है।

अध्याय १८ का यह तीसरा भाग यहीं समाप्त होता है। अन्तिम भाग (श्लोक ७६-१००) में अष्टावक्र इस विशाल अध्याय और सम्पूर्ण गीता के उस सर्वोच्च शिखर की ओर बढ़ेंगे, जहाँ "आश्चर्यम्" के महान श्लोकों सहित परम शून्यता और मौन का उद्घोष होगा। तैयार हों तो बताइए। -e

भूमिका

तीसरे भाग के अंत में एक व्यावहारिक चेतावनी के बाद, अष्टावक्र अब इस विशाल अध्याय के अंतिम पचीस श्लोकों में प्रवेश करते हैं — जहाँ भाषा अपनी सबसे सघन, सबसे मौन-उन्मुख अवस्था तक पहुँचती है। यह भाग गीता के सम्पूर्ण दर्शन का शिखर-बिन्दु है। यहाँ अष्टावक्र बार-बार शून्यता, मौन, और "कुछ नहीं" के इर्द-गिर्द घूमते हैं, मानो शब्दों के माध्यम से ही शब्दों की सीमा को दिखाना चाहते हों।

श्लोक १८.७६

मूल श्लोक (संस्कृत)

मन्दः श्रुत्वापि तद्वस्तु न जहाति विमूढताम् । निर्विकल्पो बहिर्यत्नादन्तर्विषयलालसः ॥ १८-७६॥

भावार्थ

यहाँ तक कि सत्य सुनकर भी, मंदबुद्धि व्यक्ति भ्रम को थामे रहता है। प्रयास और दमन के द्वारा वह बाहर से स्थिर प्रतीत हो सकता है, पर भीतर से वह जगत की लालसा रखता है।

यह श्लोक तीसरे भाग के अंत में दी गई चेतावनी को आगे बढ़ाता है — यह पाखंड और वास्तविक बोध के बीच का अंतर पुनः स्पष्ट करता है, यह चेतावनी देते हुए कि दमन (suppression) कोई वास्तविक समाधान नहीं, यह केवल भीतर की लालसा को छिपा देता है, मिटाता नहीं।

श्लोक १८.७७

मूल श्लोक (संस्कृत)

ज्ञानाद् गलितकर्मा यो लोकदृष्ट्यापि कर्मकृत् । नाप्नोत्यवसरं कर्तुं वक्तुमेव न किञ्चन ॥ १८-७७॥

भावार्थ

यद्यपि अन्य लोग उसे कर्मरत देखते हैं, साधु कुछ भी नहीं करता। ज्ञान ने प्रयास को निर्वासित कर दिया है। उसे करने या कहने का कोई कारण नहीं मिलता।
श्लोक १८.७८

मूल श्लोक (संस्कृत)

क्व तमः क्व प्रकाशो वा हानं क्व च न किञ्चन । निर्विकारस्य धीरस्य निरातङ्कस्य सर्वदा ॥ १८-७८॥

भावार्थ

साधु निर्भय, अजेय है। न अंधकार, न प्रकाश, कुछ भी खोने को नहीं। कुछ भी नहीं।

"कुछ भी नहीं" (Nothing) यह एकल शब्द इस श्लोक का चौंकाने वाला अंत है — यह मूल अंग्रेज़ी अनुवाद में भी इसी तरह एक पृथक, संक्षिप्त वाक्य के रूप में खड़ा है। यह शैलीगत चयन अत्यंत सार्थक है — जैसे-जैसे अध्याय अपने अंत की ओर बढ़ता है, वाक्य छोटे, अधिक खंडित होते जाते हैं, मानो भाषा स्वयं अपनी सीमा तक पहुँचकर बिखर रही हो।

श्लोक १८.७९

मूल श्लोक (संस्कृत)

क्व धैर्यं क्व विवेकित्वं क्व निरातङ्कतापि वा । अनिर्वाच्यस्वभावस्य निःस्वभावस्य योगिनः ॥ १८-७९॥

भावार्थ

धैर्य, विवेक, यहाँ तक कि निर्भयता — योगी के लिए इनका क्या उपयोग? उसका स्वभाव वर्णित नहीं किया जा सकता। वह व्यक्ति नहीं है।

यहाँ तक कि सद्गुण भी — जो साधारणतः श्रेष्ठ माने जाते हैं — अंततः अनावश्यक हो जाते हैं। "वह व्यक्ति नहीं है" यह अंतिम कथन साधु की पहचान को व्यक्तित्व की सम्पूर्ण श्रेणी से बाहर रख देता है — वह न किसी नाम का, न किसी विशेष गुण-समूह का प्रतिनिधि है।

श्लोक १८.८०

मूल श्लोक (संस्कृत)

न स्वर्गो नैव नरको जीवन्मुक्तिर्न चैव हि । बहुनात्र किमुक्तेन योगदृष्ट्या न किञ्चन ॥ १८-८०॥

भावार्थ

न स्वर्ग, न नरक, न जीवितों के लिए मुक्ति। संक्षेप में, चैतन्य शून्य है। और क्या कहा जा सकता है?

"और क्या कहा जा सकता है?" यह प्रश्न इस अध्याय की एक निरन्तर प्रवृत्ति को दर्शाता है — बार-बार वाणी अपनी सीमा तक पहुँचकर रुक जाती है, यह स्वीकार करते हुए कि अब आगे कहने के लिए कुछ शेष नहीं।

श्लोक १८.८१

मूल श्लोक (संस्कृत)

नैव प्रार्थयते लाभं नालाभेनानुशोचति । धीरस्य शीतलं चित्तममृतेनैव पूरितम् ॥ १८-८१॥

भावार्थ

साधु न पूर्णता की चाह रखता है, न अपूर्णता पर शोक करता है। उसका मन शीतल है और मिठास से भरपूर है।
श्लोक १८.८२

मूल श्लोक (संस्कृत)

न शान्तं स्तौति निष्कामो न दुष्टमपि निन्दति । समदुःखसुखस्तृप्तः किञ्चित् कृत्यं न पश्यति ॥ १८-८२॥

भावार्थ

इच्छा से मुक्त, साधु न शांति की प्रशंसा करता है, न दुष्टों की निंदा। सुख और दुःख में समान रूप से संतुष्ट, वह कुछ भी नहीं बदलना चाहेगा।
श्लोक १८.८३

मूल श्लोक (संस्कृत)

धीरो न द्वेष्टि संसारमात्मानं न दिदृक्षति । हर्षामर्षविनिर्मुक्तो न मृतो न च जीवति ॥ १८-८३॥

भावार्थ

साधु न जगत को अस्वीकार करता है, न आत्मा की चाह रखता है। वह हर्ष और शोक से मुक्त है। वह न जीता है, न मर सकता है।

"वह न जीता है, न मर सकता है" यह विरोधाभासी कथन जीवन और मृत्यु दोनों की सामान्य अवधारणाओं को पार कर जाता है — यह किसी अमरता के दावे की बात नहीं, बल्कि यह इस बात की घोषणा है कि जो साक्षी-चैतन्य है, वह जीवन-मृत्यु के चक्र में सम्मिलित ही नहीं, इसलिए उस पर "जीना" या "मरना" शब्द ही लागू नहीं होते।

श्लोक १८.८४

मूल श्लोक (संस्कृत)

निःस्नेहः पुत्रदारादौ निष्कामो विषयेषु च । निश्चिन्तः स्वशरीरेऽपि निराशः शोभते बुधः ॥ १८-८४॥

भावार्थ

बुद्धिमान व्यक्ति बिना आशा के जीता है। उसकी अपनी संतान, पत्नी, या किसी से भी कोई आसक्ति नहीं। सुख उसके लिए कुछ भी नहीं। उसका जीवन गौरवशाली है।
श्लोक १८.८५

मूल श्लोक (संस्कृत)

तुष्टिः सर्वत्र धीरस्य यथापतितवर्तिनः । स्वच्छन्दं चरतो देशान् यत्रस्तमितशायिनः ॥ १८-८५॥

भावार्थ

साधु जैसे चाहे भटकता है और जो कुछ भी सामने आता है उस पर जीता है। संतोष सदा उसके हृदय में बसा रहता है। और जब सूर्य अस्त होता है, वह जहाँ है वहीं विश्राम करता है।

यह श्लोक अत्यंत सरल और मार्मिक है — यह किसी विशाल दार्शनिक तर्क की बात नहीं करता, बल्कि एक सरल, भटकते हुए साधु के दैनिक जीवन का चित्रण करता है — भोजन जो मिल जाए, विश्राम जहाँ रात हो जाए। इस सादगी में एक गहरी स्वतंत्रता छिपी है।

श्लोक १८.८६

मूल श्लोक (संस्कृत)

पततूदेतु वा देहो नास्य चिन्ता महात्मनः । स्वभावभूमिविश्रान्तिविस्मृताशेषसंसृतेः ॥ १८-८६॥

भावार्थ

अस्तित्व में जड़ जमाए, जन्म या पुनर्जन्म के विचार से मुक्त, महान आत्मा अपनी देह के जन्म या मृत्यु के प्रति उदासीन है।
श्लोक १८.८७

मूल श्लोक (संस्कृत)

अकिञ्चनः कामचारो निर्द्वन्द्वश्छिन्नसंशयः । असक्तः सर्वभावेषु केवलो रमते बुधः ॥ १८-८७॥

भावार्थ

बुद्धिमान व्यक्ति अकेला खड़ा है, किसी वस्तु की परवाह न करते हुए, सम्पत्ति से रहित। वह जहाँ चाहे जाता है, विरोधाभासों से अबाधित, अपने संदेहों को चीरता हुआ। वह सचमुच धन्य है।
श्लोक १८.८८

मूल श्लोक (संस्कृत)

निर्ममः शोभते धीरः समलोष्टाश्मकाञ्चनः । सुभिन्नहृदयग्रन्थिर्विनिर्धूतरजस्तमः ॥ १८-८८॥

भावार्थ

बुद्धिमान व्यक्ति के लिए "मेरापन" का कोई भाव नहीं। उसके लिए भूमि, पत्थर और सोना समान हैं। उसके हृदय की गाँठें खुल चुकी हैं। वह न अज्ञान जानता है, न शोक। वह हर प्रकार से उत्कृष्ट है।

"भूमि, पत्थर और सोना समान हैं" यह उल्लेखनीय है — मूल्य-भेद (कि सोना बहुमूल्य है, पत्थर तुच्छ) एक सामाजिक निर्माण है; जिसने वस्तुओं के मूल एकत्व को पहचान लिया है, उसके लिए यह भेद निरर्थक हो जाता है।

श्लोक १८.८९

मूल श्लोक (संस्कृत)

सर्वत्रानवधानस्य न किञ्चिद् वासना हृदि । मुक्तात्मनो वितृप्तस्य तुलना केन जायते ॥ १८-८९॥

भावार्थ

मुक्त आत्मा के हृदय में कोई इच्छा नहीं। वह संतुष्ट और उदासीन है। उसका कोई सानी नहीं।
श्लोक १८.९०

मूल श्लोक (संस्कृत)

जानन्नपि न जानाति पश्यन्नपि न पश्यति । ब्रुवन्न् अपि न च ब्रूते कोऽन्यो निर्वासनादृते ॥ १८-९०॥

भावार्थ

केवल वही जो इच्छा-रहित है, जानने के बारे में कुछ नहीं जानता, कहता है कि कुछ भी कहने योग्य नहीं, देखता है कि कुछ भी देखने योग्य नहीं।
श्लोक १८.९१

मूल श्लोक (संस्कृत)

भिक्षुर्वा भूपतिर्वापि यो निष्कामः स शोभते । भावेषु गलिता यस्य शोभनाशोभना मतिः ॥ १८-९१॥

भावार्थ

जो इच्छा-रहित है वह श्रेष्ठ है, चाहे वह भिखारी हो या राजा। वह अब भला-बुरा नहीं देखता।

यह श्लोक सामाजिक स्थिति की सम्पूर्ण अप्रासंगिकता को घोषित करता है — भिखारी और राजा, दोनों समान रूप से इस श्रेष्ठता तक पहुँच सकते हैं, क्योंकि यह श्रेष्ठता बाहरी स्थिति पर नहीं, केवल आन्तरिक इच्छा-रहितता पर निर्भर है।

श्लोक १८.९२

मूल श्लोक (संस्कृत)

क्व स्वाच्छन्द्यं क्व सङ्कोचः क्व वा तत्त्वविनिश्चयः । निर्व्याजार्जवभूतस्य चरितार्थस्य योगिनः ॥ १८-९२॥

भावार्थ

वासना या संयम क्या है, या सत्य की इच्छा क्या है, उस योगी के लिए जिसने जीवन का लक्ष्य पा लिया है, और जो सद्गुण और सच्चाई का अवतार है?
श्लोक १८.९३

मूल श्लोक (संस्कृत)

आत्मविश्रान्तितृप्तेन निराशेन गतार्तिना । अन्तर्यदनुभूयेत तत् कथं कस्य कथ्यते ॥ १८-९३॥

भावार्थ

उस व्यक्ति का आन्तरिक अनुभव, जो इच्छा और दुःख से मुक्त है, जो संतुष्ट है और स्वयं में विश्राम पाता है — इसे कैसे वर्णित किया जा सकता है, और किसके लिए?
श्लोक १८.९४

मूल श्लोक (संस्कृत)

सुप्तोऽपि न सुषुप्तौ च स्वप्नेऽपि शयितो न च । जागरेऽपि न जागर्ति धीरस्तृप्तः पदे पदे ॥ १८-९४॥

भावार्थ

ज्ञानी की अवस्था कभी नहीं बदलती। गहरी नींद में सोकर भी, वह सोया हुआ नहीं है। स्वप्न में रहते हुए, वह स्वप्न नहीं देख रहा। आँखें खुली होकर भी, वह जागृत नहीं है।

यह श्लोक अध्याय १४ और अध्याय १७ में उठाए गए जागृति-निद्रा विरोधाभास को उसकी चरम अभिव्यक्ति तक ले जाता है — तीनों सामान्य अवस्थाएँ (जागृति, स्वप्न, गहरी नींद) एक साथ नकार दी जाती हैं, यह इंगित करते हुए कि ज्ञानी की वास्तविक अवस्था इन तीनों साधारण अवस्थाओं से परे, एक चौथी, अवर्णनीय अवस्था (जिसे वेदान्त में "तुरीय" कहा जाता है) में स्थित है।

श्लोक १८.९५

मूल श्लोक (संस्कृत)

ज्ञः सचिन्तोऽपि निश्चिन्तः सेन्द्रियोऽपि निरिन्द्रियः । सुबुद्धिरपि निर्बुद्धिः साहङ्कारोऽनहङ्कृतिः ॥ १८-९५॥

भावार्थ

ज्ञानी सोचता हुआ प्रतीत होता है, पर उसके कोई विचार नहीं। वह इन्द्रिय-बोध रखता प्रतीत होता है, पर अनुभव नहीं करता। वह बुद्धि रखता प्रतीत होता है, पर उसका मन खाली है। वह व्यक्ति प्रतीत होता है, पर है नहीं।
श्लोक १८.९६

मूल श्लोक (संस्कृत)

न सुखी न च वा दुःखी न विरक्तो न सङ्गवान् । न मुमुक्षुर्न वा मुक्ता न किञ्चिन्न च किञ्चन ॥ १८-९६॥

भावार्थ

ज्ञानी न सुखी है, न दुःखी, न असंग है, न आसक्त, न मुक्त है, न मुक्ति की खोज में। वह न यह है, न वह।
श्लोक १८.९७

मूल श्लोक (संस्कृत)

विक्षेपेऽपि न विक्षिप्तः समाधौ न समाधिमान् । जाड्येऽपि न जडो धन्यः पाण्डित्येऽपि न पण्डितः ॥ १८-९७॥

भावार्थ

विचलित होते हुए भी धन्य व्यक्ति स्थिर है। ध्यान में, वह ध्यान नहीं करता। अज्ञान में, वह स्पष्ट बना रहता है। विद्वान होते हुए भी, वह कुछ भी नहीं जानता।
श्लोक १८.९८

मूल श्लोक (संस्कृत)

मुक्तो यथास्थितिस्वस्थः कृतकर्तव्यनिर्वृतः । समः सर्वत्र वैतृष्ण्यान्न स्मरत्यकृतं कृतम् ॥ १८-९८॥

भावार्थ

मुक्त आत्मा, जो आत्मा में निरपेक्ष रूप से स्थित है, जो कर्म और कर्तव्य की अवधारणा से मुक्त है, जो सदा और सर्वत्र समान है, इच्छा-रहित है। वह इस बात की चिंता नहीं करता कि उसने क्या किया या क्या नहीं किया।
श्लोक १८.९९

मूल श्लोक (संस्कृत)

न प्रीयते वन्द्यमानो निन्द्यमानो न कुप्यति । नैवोद्विजति मरणे जीवने नाभिनन्दति ॥ १८-९९॥

भावार्थ

बुद्धिमान व्यक्ति न प्रशंसा से प्रसन्न होता है, न निन्दा से नाराज़। वह न जीवन में हर्षित होता है, न मृत्यु से भयभीत।
श्लोक १८.१००

मूल श्लोक (संस्कृत)

न धावति जनाकीर्णं नारण्यमुपशान्तधीः । यथातथा यत्रतत्र सम एवावतिष्ठते ॥ १८-१००॥

भावार्थ

स्थिर मन वाला व्यक्ति न भीड़ खोजता है, न एकांत। वह जहाँ भी जाता है वैसा ही रहता है।

अध्याय १८ का समापन, और इसके साथ ही गीता के इस विशालतम अध्याय की परिसमाप्ति, अत्यंत शांत, लगभग साधारण स्वर में होती है — "वह जहाँ भी जाता है वैसा ही रहता है।" सौ श्लोकों की इस विशाल यात्रा के बाद, जिसमें सृष्टि की शून्यता, ज्ञान की सीमा, कर्तृत्व का विसर्जन, और परम मौन जैसे गहनतम विषयों का अन्वेषण हुआ, यह अध्याय एक अत्यंत सरल सत्य पर आकर विश्राम पाता है — स्थिरता कोई विशेष स्थान या परिस्थिति नहीं माँगती, वह हर जगह समान रूप से उपलब्ध है, क्योंकि वह किसी बाहरी वस्तु पर निर्भर ही नहीं।

गीता का यह विशालतम अध्याय यहाँ पूर्ण होता है। अब केवल दो लघु अध्याय शेष हैं — अध्याय १९ और २०, जिनमें जनक अपने अंतिम, पूर्णतः शब्द-रहित विश्राम की घोषणा करेंगे, प्रश्नों की एक शृंखला के माध्यम से जो अपने ही अर्थहीनता की ओर इशारा करती है। तैयार हों तो अध्याय १९ प्रस्तुत करूँगा। -e