अध्याय ४

आत्मज्ञान की महिमा

भूमिका

यह अध्याय बहुत छोटा है — केवल छह श्लोक — पर इसका स्वर पूर्णतः भिन्न है। जनक अष्टावक्र के तीखे प्रश्नों का सीधा उत्तर नहीं देते, प्रतिवाद भी नहीं करते। इसके बजाय वे एक और ही ऊँचाई से बोलते हैं — "जो जानता है, वह ईश्वर के समान स्वतंत्र है, उसकी लीला पर प्रश्न नहीं उठाया जा सकता।" यह लघु अध्याय आत्मज्ञानी की उस स्वतंत्रता की घोषणा है जो सामान्य नैतिक कसौटियों से परे है। यह ध्यान देने योग्य है कि जनक अष्टावक्र के आरोपों को नकारते नहीं, बल्कि पूरे प्रश्न के ढाँचे को ही एक उच्चतर दृष्टिकोण से पुनर्परिभाषित करते हैं।

श्लोक ४.१

मूल श्लोक (संस्कृत)

जनक उवाच ॥ हन्तात्मज्ञानस्य धीरस्य खेलतो भोगलीलया । न हि संसारवाहीकैर्मूढैः सह समानता ॥ ४-१॥

भावार्थ

निश्चय ही, जो आत्मा को जानता है, चाहे वह जीवन का खेल खेले, संसार के मोहग्रस्त बोझ ढोते प्राणियों से सर्वथा भिन्न है।

जनक यहाँ स्वीकार करते हैं कि ज्ञानी भी बाह्य रूप से साधारण जीवन जी सकता है — काम कर सकता है, सम्बन्ध निभा सकता है, यहाँ तक कि वे सारी गतिविधियाँ भी कर सकता है जिन पर अष्टावक्र ने प्रश्न उठाए थे — पर भीतर से वह भार से मुक्त है, जबकि साधारण मनुष्य उसी जीवन को बोझ की तरह ढोता है। अन्तर क्रिया में नहीं, भीतर की स्थिति में है। "जीवन का खेल" (life's game) यह वाक्यांश महत्वपूर्ण है — यह जीवन को न तो पूर्णतः गम्भीर, न पूर्णतः तुच्छ मानता, बल्कि एक क्रीड़ा के रूप में देखता है, जिसमें भाग लेना सम्भव है बिना उससे बोझिल हुए।

श्लोक ४.२

मूल श्लोक (संस्कृत)

यत् पदं प्रेप्सवो दीनाः शक्राद्याः सर्वदेवताः । अहो तत्र स्थितो योगी न हर्षमुपगच्छति ॥ ४-२॥

भावार्थ

सच में योगी उस उन्नत अवस्था में भी उल्लास अनुभव नहीं करता, जिसे इन्द्र और असंतुष्ट देवता तरसते हैं।

यह श्लोक चौंकाने वाला है — इन्द्र जैसे देवता भी, अपने समस्त वैभव के बावजूद, तृष्णा में जीते हैं। पौराणिक कथाओं में इन्द्र को स्वर्ग का राजा, समस्त ऐश्वर्य का स्वामी दिखाया गया है, और फिर भी परम्परा में यह मान्यता है कि इन्द्र भी सदा भय और असुरक्षा में जीता है (कि कहीं उसका पद कोई तपस्वी न छीन ले)। यह दिखाना कि सर्वोच्च दैवी सुख भी तृष्णा से मुक्त नहीं, ज्ञानी की श्रेष्ठता को और भी उजागर करता है — क्योंकि ज्ञानी, चाहे उसे कोई भी उच्च अवस्था प्राप्त हो, उसमें उल्लसित नहीं होता, क्योंकि उल्लास भी एक द्वैत-भाव है, और वह द्वैत से परे जा चुका है।

श्लोक ४.३

मूल श्लोक (संस्कृत)

तज्ज्ञस्य पुण्यपापाभ्यां स्पर्शो ह्यन्तर्न जायते । न ह्याकाशस्य धूमेन दृश्यमानापि सङ्गतिः ॥ ४-३॥

भावार्थ

सच में, जो उस तत्त्व को जानता है, वह पुण्य या पाप से अस्पर्शित रहता है — जैसे आकाश धुएँ से अस्पर्शित रहता है, यद्यपि वह स्पर्शित प्रतीत होता है।

धुआँ आकाश में फैलता है, पर आकाश को न वह मैला करता है, न रंगता है — आकाश सदा वैसा ही स्वच्छ बना रहता है, चाहे धुआँ कितना भी घना क्यों न हो। "यद्यपि वह स्पर्शित प्रतीत होता है" यह वाक्यांश महत्वपूर्ण जोड़ है — यह स्वीकार करता है कि बाहर से देखने पर धुएँ से भरा आकाश धूमिल दिखाई देता है, ठीक वैसे ही जैसे कर्मों का प्रभाव देह और मन पर पड़ता प्रतीत होता है — पर वास्तविकता में, आत्मा अछूती रहती है, जैसे आकाश अपने मूल स्वभाव में सदा स्वच्छ है।

श्लोक ४.४

मूल श्लोक (संस्कृत)

आत्मैवेदं जगत्सर्वं ज्ञातं येन महात्मना । यदृच्छया वर्तमानं तं निषेद्धुं क्षमेत कः ॥ ४-४॥

भावार्थ

महान आत्मा को, जो सृष्टि को आत्मा के रूप में जानता है, जीवन को जैसे-जैसे वह आए वैसे जीने से कौन रोक सकता है?

यह प्रश्न-शैली में दिया गया कथन अष्टावक्र के उन आरोपों का अप्रत्यक्ष उत्तर है जो पिछले अध्याय में उठाए गए थे। जनक मानो कह रहे हों — "यदि सम्पूर्ण सृष्टि ही आत्मा है, तो मेरे किसी भी कर्म को किस आधार पर 'गलत' या 'बेमेल' कहा जा सकता है? कौन-सा प्राधिकार मुझे रोक सकता है, जब रोकने वाला और रोका जाने वाला दोनों एक ही तत्त्व हैं?"

श्लोक ४.५

मूल श्लोक (संस्कृत)

आब्रह्मस्तम्बपर्यन्ते भूतग्रामे चतुर्विधे । विज्ञस्यैव हि सामर्थ्यमिच्छानिच्छाविवर्जने ॥ ४-५॥

भावार्थ

ब्रह्मा से लेकर तिनके तक, चार प्रकार के प्राणियों में से, केवल साधु ही राग और द्वेष का त्याग कर सकता है।

यहाँ जनक सृष्टि के सम्पूर्ण पदानुक्रम की बात करते हैं — सबसे ऊँचे देवता ब्रह्मा से लेकर सबसे साधारण तिनके तक। भारतीय परम्परा में "चार प्रकार के प्राणी" (चतुर्विध भूत) से आशय अंडज (अंडे से जन्मे), जरायुज (गर्भ से जन्मे), स्वेदज (नमी से जन्मे), और उद्भिज्ज (पृथ्वी फोड़कर उगने वाले, जैसे पौधे) से लिया जाता है — अर्थात समस्त सजीव सृष्टि। इस विशाल फैलाव में भी, राग-द्वेष से मुक्त होने की क्षमता केवल ज्ञानी साधु में है — यह कोई पद या योनि की बात नहीं, केवल बोध की बात है। यह लोकतांत्रिक भी है और विशिष्ट भी — लोकतांत्रिक इसलिए कि कोई भी योनि इसे बाधित नहीं करती (सिद्धांततः), विशिष्ट इसलिए कि यह क्षमता आत्म-साक्षात्कार पर ही निर्भर है, जन्म या स्थिति पर नहीं।

श्लोक ४.६

मूल श्लोक (संस्कृत)

आत्मानमद्वयं कश्चिज्जानाति जगदीश्वरम् । यद् वेत्ति तत्स कुरुते न भयं तस्य कुत्रचित् ॥ ४-६॥

भावार्थ

दुर्लभ है वह जो स्वयं को अद्वितीय एक के रूप में जानता है — सृष्टि का स्वामी। वह जैसा जानता है वैसा ही आचरण करता है, और कभी भयभीत नहीं होता।

अध्याय का समापन निर्भयता की घोषणा से होता है। जो जानता है कि वह स्वयं ही "सृष्टि का स्वामी" है, उसके लिए भय का कोई आधार शेष नहीं रहता — क्योंकि भय सदा किसी "अन्य" से उत्पन्न होता है, और जहाँ अद्वैत का बोध हो, वहाँ कोई "अन्य" शेष नहीं। "जैसा जानता है वैसा ही आचरण करता है" यह वाक्यांश इस अध्याय के केन्द्रीय संदेश को समेटता है — ज्ञानी का आचरण उसके भीतरी बोध का प्रत्यक्ष प्रतिबिम्ब है, बाहरी नियमों की नकल नहीं।

यह संक्षिप्त अध्याय आत्मज्ञानी की स्वतन्त्र गरिमा का उद्घोष है। अगले अध्याय में अष्टावक्र मात्र चार श्लोकों में विलय (dissolution) के अगले चरण की ओर इशारा करेंगे — गीता का सबसे संक्षिप्त पर सघन अध्याय। -e