मूल श्लोक (संस्कृत)
अष्टावक्र उवाच ॥ न ते सङ्गोऽस्ति केनापि किं शुद्धस्त्यक्तुमिच्छसि । सङ्घातविलयं कुर्वन्नेवमेव लयं व्रज ॥ ५-१॥
भावार्थ
तुम निर्मल हो, किसी वस्तु से अस्पर्शित। त्यागने योग्य क्या है? मन जटिल है — उसे जाने दो। विलय की शांति को जानो।
अष्टावक्र स्पष्ट करते हैं — त्याग की बात करना ही एक भ्रम है, क्योंकि त्यागने के लिए यह मानना पड़ता है कि पहले कुछ पकड़ा हुआ था। जो सदा निर्मल है, उसके लिए त्याग शब्द ही अर्थहीन हो जाता है। इसमें एक सूक्ष्म तार्किक बिन्दु छिपा है — "त्याग" की अवधारणा ही यह मान लेती है कि एक कर्ता है जो किसी वस्तु को पकड़े हुए था और अब उसे छोड़ रहा है। यदि आत्मा सदा से ही अस्पर्शित थी, तो यह पूरी संरचना ही निराधार हो जाती है। "मन जटिल है — उसे जाने दो" यह व्यावहारिक निर्देश है — मन की जटिलता से लड़ने की आवश्यकता नहीं, केवल उसे शिथिल छोड़ देना है, जैसे उलझे हुए धागे को खींचने के बजाय ढीला छोड़ देना।
