अध्याय ६

उच्चतर ज्ञान

भूमिका

अष्टावक्र ने चार संक्षिप्त श्लोकों में विलय की बात कही थी। जनक भी उसी संक्षिप्तता और शैली में उत्तर देते हैं — मानो कह रहे हों "गुरुवर, यह तो मैं पहले से जानता हूँ।" यह प्रत्युत्तर विनम्र भी है और आत्मविश्वास से भरा भी। ध्यान दें कि चारों श्लोकों की अंतिम पंक्ति एक ही है — "न त्यागने की आवश्यकता है, न स्वीकारने की, न नष्ट करने की" — मानो जनक एक ही सत्य को अलग-अलग रूपकों से दोहरा रहे हों, उसे और दृढ़ करते हुए। यह दोहराव आकस्मिक नहीं — भारतीय शिक्षण-परम्परा में एक ही सत्य को विभिन्न रूपकों से दोहराना (जिसे "आवृत्ति" कहा जाता है) एक सुस्थापित विधि है, जिससे बोध केवल बौद्धिक स्तर पर न रहकर हृदय में गहरा बैठ जाए।

श्लोक ६.१

मूल श्लोक (संस्कृत)

जनक उवाच ॥ आकाशवदनन्तोऽहं घटवत् प्राकृतं जगत् । इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः ॥ ६-१॥

भावार्थ

मैं अनन्त आकाश हूँ; सृष्टि एक घड़ा है। यह मैं जानता हूँ। न त्यागने की, न स्वीकारने की, न नष्ट करने की आवश्यकता है।

घड़े के भीतर का आकाश और घड़े के बाहर का आकाश — दोनों एक ही आकाश हैं, घड़ा केवल एक सीमा-रेखा खींचता प्रतीत होता है। जनक स्वयं को उस असीम आकाश के रूप में पहचानते हैं, जिसमें सृष्टि एक सीमित घड़े के समान प्रतीत तो होती है, पर आकाश को विभाजित नहीं कर सकती। यह उपमा विशेष रूप से सशक्त है क्योंकि आकाश और घट-आकाश के बीच कोई भौतिक बाधा नहीं — घड़ा तोड़ने से पहले भी दोनों वास्तव में एक ही थे, केवल प्रतीति में विभाजित लगते थे।

श्लोक ६.२

मूल श्लोक (संस्कृत)

महोदधिरिवाहं स प्रपञ्चो वीचिसन्निभः । इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः ॥ ६-२॥

भावार्थ

मैं तटरहित सागर हूँ; सृष्टि लहरें बनाती है। यह मैं जानता हूँ। न त्यागने की, न स्वीकारने की, न नष्ट करने की आवश्यकता है।
श्लोक ६.३

मूल श्लोक (संस्कृत)

अहं स शुक्तिसङ्काशो रूप्यवद् विश्वकल्पना । इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः ॥ ६-३॥

भावार्थ

मैं सीप हूँ; सृष्टि चाँदी का भ्रम है। यह मैं जानता हूँ। न त्यागने की, न स्वीकारने की, न नष्ट करने की आवश्यकता है।

तीन दृष्टान्त — आकाश-घड़ा, सागर-लहर, सीप-चाँदी — तीनों में एक ही संरचना दोहराई गई है: एक अपरिवर्तनशील आधार, और उस पर प्रतीत होने वाला एक अस्थायी रूप। जनक जानबूझकर यही एक सत्य बार-बार दोहरा रहे हैं, मानो उसे भीतर और गहरा बैठाना चाहते हों। ध्यान दें कि इन तीनों दृष्टान्तों में तीव्रता बढ़ती जाती है — आकाश-घड़ा अपेक्षाकृत सरल भेद है (स्थान का), सागर-लहर एक गतिशील भेद है (आकार का), और सीप-चाँदी सबसे सूक्ष्म है क्योंकि यह पूर्ण भ्रम की उपमा है — चाँदी वहाँ है ही नहीं, केवल दिखती है।

श्लोक ६.४

मूल श्लोक (संस्कृत)

अहं वा सर्वभूतेषु सर्वभूतान्यथो मयि । इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः ॥ ६-४॥

भावार्थ

मैं समस्त प्राणियों में हूँ; समस्त प्राणी मुझमें हैं। यह मैं जानता हूँ। न त्यागने की, न स्वीकारने की, न नष्ट करने की आवश्यकता है।

अंतिम श्लोक पिछले तीन दृष्टान्तों से आगे बढ़कर सीधे सम्बन्ध की भाषा में सत्य कहता है — कोई रूपक नहीं, केवल सीधा कथन: "मैं समस्त प्राणियों में हूँ; समस्त प्राणी मुझमें हैं।" यह अद्वैत की चरम अभिव्यक्ति है, जहाँ न कोई पृथकता शेष रहती है, न कोई कार्य करने योग्य शेष रहता है। इस अन्तिम श्लोक में रूपक का त्याग करना स्वयं में सार्थक है — मानो जनक कह रहे हों कि अब उपमाओं की आवश्यकता भी नहीं रही, सत्य को सीधे कहा जा सकता है।

चार-चार श्लोकों के इस आदान-प्रदान में गुरु-शिष्य अब एक ही स्तर पर मिल चुके हैं। अगले अध्याय में जनक इसी भाव को और विस्तार देंगे, अपनी स्थिति का वर्णन "शान्त सागर" के रूपक से आगे बढ़ाते हुए। -e