मूल श्लोक (संस्कृत)
जनक उवाच ॥ आकाशवदनन्तोऽहं घटवत् प्राकृतं जगत् । इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः ॥ ६-१॥
भावार्थ
मैं अनन्त आकाश हूँ; सृष्टि एक घड़ा है। यह मैं जानता हूँ। न त्यागने की, न स्वीकारने की, न नष्ट करने की आवश्यकता है।
घड़े के भीतर का आकाश और घड़े के बाहर का आकाश — दोनों एक ही आकाश हैं, घड़ा केवल एक सीमा-रेखा खींचता प्रतीत होता है। जनक स्वयं को उस असीम आकाश के रूप में पहचानते हैं, जिसमें सृष्टि एक सीमित घड़े के समान प्रतीत तो होती है, पर आकाश को विभाजित नहीं कर सकती। यह उपमा विशेष रूप से सशक्त है क्योंकि आकाश और घट-आकाश के बीच कोई भौतिक बाधा नहीं — घड़ा तोड़ने से पहले भी दोनों वास्तव में एक ही थे, केवल प्रतीति में विभाजित लगते थे।
