मूल श्लोक (संस्कृत)
जनक उवाच ॥ मय्यनन्तमहाम्भोधौ विश्वपोत इतस्ततः । भ्रमति स्वान्तवातेन न ममास्त्यसहिष्णुता ॥ ७-१॥
भावार्थ
मुझ तटरहित सागर में, सृष्टि की नौका इधर-उधर बहती है अपनी प्रकृति की हवाओं पर। मैं अधीर नहीं होता।
जनक अब सृष्टि को शत्रु या भ्रम के रूप में नहीं, एक नौका के रूप में देखते हैं जो अपनी ही प्रकृति के अनुसार बहती है। "मैं अधीर नहीं होता" — यह वाक्य दर्शाता है कि ज्ञान के बाद जीवन के प्रति कोई विरोध शेष नहीं रहता, केवल एक शान्त अवलोकन रहता है। "नौका" की उपमा विशेष रूप से सुन्दर है क्योंकि यह जगत को न तो भयावह (सर्प की तरह) और न ही तुच्छ (फेन की तरह) दिखाती, बल्कि एक ऐसी वस्तु के रूप में दिखाती है जिसका अपना उद्देश्य और गति है, जिसे केवल देखा जा सकता है, नियंत्रित करने की आवश्यकता नहीं।
