अध्याय ७

आत्मज्ञान का स्वभाव

भूमिका

अध्याय ६ में जनक ने संक्षेप में अपनी स्थिति व्यक्त की थी, पर वे वहीं रुक नहीं पाते। इस अध्याय में वे उसी "तटरहित सागर" के रूपक को और विस्तार देते हैं, मानो उस अनुभव के भीतर और गहरे उतरना चाहते हों। यह अध्याय किसी नई शिक्षा का नहीं, बल्कि एक ही सत्य में निवास करने के आनन्द का वर्णन है — "मैं इसी में स्थित हूँ" यह पंक्ति बार-बार लौटती है, एक स्थिरता के गीत की भाँति। इस अध्याय में जनक की भाषा में पहले से अधिक विश्राम है — तर्क कम, अनुभव अधिक।

श्लोक ७.१

मूल श्लोक (संस्कृत)

जनक उवाच ॥ मय्यनन्तमहाम्भोधौ विश्वपोत इतस्ततः । भ्रमति स्वान्तवातेन न ममास्त्यसहिष्णुता ॥ ७-१॥

भावार्थ

मुझ तटरहित सागर में, सृष्टि की नौका इधर-उधर बहती है अपनी प्रकृति की हवाओं पर। मैं अधीर नहीं होता।

जनक अब सृष्टि को शत्रु या भ्रम के रूप में नहीं, एक नौका के रूप में देखते हैं जो अपनी ही प्रकृति के अनुसार बहती है। "मैं अधीर नहीं होता" — यह वाक्य दर्शाता है कि ज्ञान के बाद जीवन के प्रति कोई विरोध शेष नहीं रहता, केवल एक शान्त अवलोकन रहता है। "नौका" की उपमा विशेष रूप से सुन्दर है क्योंकि यह जगत को न तो भयावह (सर्प की तरह) और न ही तुच्छ (फेन की तरह) दिखाती, बल्कि एक ऐसी वस्तु के रूप में दिखाती है जिसका अपना उद्देश्य और गति है, जिसे केवल देखा जा सकता है, नियंत्रित करने की आवश्यकता नहीं।

श्लोक ७.२

मूल श्लोक (संस्कृत)

मय्यनन्तमहाम्भोधौ जगद्वीचिः स्वभावतः । उदेतु वास्तमायातु न मे वृद्धिर्न च क्षतिः ॥ ७-२॥

भावार्थ

मुझ तटरहित सागर में, सृष्टि की लहरों को उठने और गिरने दो जैसा वे चाहें। मैं न बढ़ता हूँ, न घटता हूँ।

सागर की गहराई और विशालता का माप लहरों की ऊँचाई से नहीं होता। चाहे लहरें कितनी भी ऊँची उठें या शान्त हो जाएँ, सागर का मूल आयतन अपरिवर्तित रहता है। ऐसे ही जीवन के उतार-चढ़ाव आत्मा की पूर्णता को न बढ़ाते हैं, न घटाते हैं। यह श्लोक एक महत्वपूर्ण व्यावहारिक सत्य को छूता है — सफलता या असफलता, प्रशंसा या निन्दा, ये सब "लहरें" हैं जो सतह पर घटित होती हैं, पर आत्मा की मूल परिपूर्णता को कभी स्पर्श नहीं कर पातीं।

श्लोक ७.३

मूल श्लोक (संस्कृत)

मय्यनन्तमहाम्भोधौ विश्वं नाम विकल्पना । अतिशान्तो निराकार एतदेवाहमास्थितः ॥ ७-३॥

भावार्थ

मुझ तटरहित सागर में, सृष्टि की कल्पना होती है। मैं स्थिर और निराकार हूँ। इसी में मात्र मैं स्थित हूँ।
श्लोक ७.४

मूल श्लोक (संस्कृत)

नात्मा भावेषु नो भावस्तत्रानन्ते निरञ्जने । इत्यसक्तोऽस्पृहः शान्त एतदेवाहमास्थितः ॥ ७-४॥

भावार्थ

आत्मा वस्तुओं में नहीं है, न ही वस्तुएँ शुद्ध और अनन्त आत्मा में हैं। आत्मा शान्त है, आसक्ति और इच्छा से मुक्त। इसी में मात्र मैं स्थित हूँ।

यह श्लोक एक सूक्ष्म पर महत्वपूर्ण भेद स्पष्ट करता है — पिछले अध्यायों में सृष्टि को आत्मा में "प्रकट होने वाली" कहा गया था, पर यहाँ जनक और आगे बढ़कर कहते हैं कि आत्मा का वस्तुओं से कोई वास्तविक सम्बन्ध ही नहीं — न वस्तुएँ आत्मा के भीतर हैं, न आत्मा वस्तुओं में उलझी है। सम्बन्ध की भाषा भी अन्ततः केवल कल्पना है। यह श्लोक अद्वैत के उस सूक्ष्मतम बिन्दु को छूता है जहाँ "में होना" (containment) की अवधारणा भी अंततः द्वैत की भाषा है — क्योंकि "में होना" के लिए दो पृथक वस्तुएँ चाहिए, एक धारण करने वाली और एक धारित।

श्लोक ७.५

मूल श्लोक (संस्कृत)

अहो चिन्मात्रमेवाहमिन्द्रजालोपमं जगत् । इति मम कथं कुत्र हेयोपादेयकल्पना ॥ ७-५॥

भावार्थ

मैं केवल चैतन्य हूँ। जगत एक बीतता हुआ दृश्य है। स्वीकार या अस्वीकार के विचार कैसे उठ सकते हैं? और कहाँ?

अध्याय का समापन एक प्रश्न से होता है, उत्तर से नहीं — और यही इसकी गहराई है। जब जगत को "बीतता हुआ दृश्य" के रूप में देखा जाए, तो उसके प्रति स्वीकृति या अस्वीकृति का प्रश्न ही निरर्थक हो जाता है, क्योंकि स्वीकार-अस्वीकार के लिए भी एक करने वाला और एक स्थान चाहिए — और यहाँ न कोई करने वाला शेष है, न कोई स्थान। "और कहाँ?" यह अतिरिक्त प्रश्न विशेष रूप से गहन है — यह न केवल यह पूछता है "कौन स्वीकार करे," बल्कि यह भी कि "किस स्थान में यह स्वीकार-अस्वीकार घटित हो?" — जब स्थान और कर्ता दोनों की अवधारणा ही ढह जाए, तो प्रश्न स्वयं अपनी नींव खो देता है।

इस अध्याय में जनक "स्थिति" के आनन्द में डूबे हुए हैं। पर अष्टावक्र फिर से लौटेंगे — अगले अध्याय में वे बंधन और मुक्ति के मूल स्वरूप को केवल चार तीक्ष्ण श्लोकों में उजागर करेंगे। -e