अध्याय ८

बंधन और मुक्ति

भूमिका

जनक की स्थिरता के गीत के बाद अष्टावक्र फिर से बोलते हैं, पर अब उनका स्वर व्यावहारिक है — मानो कह रहे हों "यह सुन्दर वर्णन तो ठीक है, अब मूल तत्त्व समझ लो।" यह अध्याय केवल चार श्लोकों में बंधन और मुक्ति की सम्पूर्ण परिभाषा दे देता है, बिना किसी रूपक के, सीधी भाषा में — मानो अष्टावक्र चाहते हैं कि यह सूत्र जनक के मन में शब्दशः अंकित हो जाए। पहले तीन अध्यायों (५, ६, ७) में जो कुछ रूपकों और उपमाओं के माध्यम से कहा गया था, वह अब यहाँ एक शुद्ध, तकनीकी परिभाषा के रूप में संक्षिप्त कर दिया गया है।

श्लोक ८.१

मूल श्लोक (संस्कृत)

अष्टावक्र उवाच ॥ तदा बन्धो यदा चित्तं किञ्चिद् वाञ्छति शोचति । किञ्चिन् मुञ्चति गृह्णाति किञ्चिद्धृष्यति कुप्यति ॥ ८-१॥

भावार्थ

जब मन वस्तुओं की इच्छा करता है या शोक करता है, स्वीकारता है या अस्वीकारता है, प्रसन्न होता है या अप्रसन्न — यही बंधन है।

अष्टावक्र यहाँ बंधन की परिभाषा किसी बाहरी परिस्थिति से नहीं, बल्कि मन की प्रतिक्रिया से करते हैं। यह देखना महत्वपूर्ण है — बंधन का स्रोत जगत नहीं, जगत के प्रति मन की हलचल है। इस श्लोक में छह मानसिक क्रियाएँ गिनाई गई हैं — इच्छा, शोक, स्वीकार, अस्वीकार, प्रसन्नता, अप्रसन्नता — ये तीन जोड़े में हैं, और प्रत्येक जोड़ी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं (इच्छा और शोक एक-दूसरे के प्रतिबिम्ब हैं, स्वीकार और अस्वीकार भी, प्रसन्नता और अप्रसन्नता भी)। यह सूची इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बताती है कि बंधन केवल नकारात्मक भावनाओं में नहीं, बल्कि सकारात्मक प्रतीत होने वाली प्रतिक्रियाओं में भी है — प्रसन्नता भी उतना ही बंधन है जितना अप्रसन्नता, यदि वह किसी वस्तु पर निर्भर हो।

श्लोक ८.२

मूल श्लोक (संस्कृत)

तदा मुक्तिर्यदा चित्तं न वाञ्छति न शोचति । न मुञ्चति न गृह्णाति न हृष्यति न कुप्यति ॥ ८-२॥

भावार्थ

जब मन इच्छा या शोक नहीं करता, स्वीकार या अस्वीकार नहीं करता, प्रसन्न या अप्रसन्न नहीं होता — मुक्ति निकट है।

पहला श्लोक और यह श्लोक एक ही सूची को उलटकर प्रस्तुत करते हैं — यह पुनरावृत्ति जानबूझकर की गई है, ताकि विद्यार्थी बंधन और मुक्ति को एक ही सिक्के के दो पहलुओं के रूप में स्पष्टतः देख सके। ध्यान दें — दोनों ही मन की अवस्था हैं, कोई बाहरी घटना नहीं। "मुक्ति निकट है" यह वाक्यांश भी सार्थक है — "निकट है," "प्राप्त हो गई" नहीं — यह इंगित करता है कि यह अवस्था कोई दूरस्थ लक्ष्य नहीं, बल्कि जब भी मन इन छह प्रतिक्रियाओं से रहित हो, मुक्ति तुरन्त निकट आ जाती है, लगभग स्वतः।

श्लोक ८.३

मूल श्लोक (संस्कृत)

तदा बन्धो यदा चित्तं सक्तं कास्वपि दृष्टिषु । तदा मोक्षो यदा चित्तमसक्तं सर्वदृष्टिषु ॥ ८-३॥

भावार्थ

यदि मन किसी अनुभव से आसक्त है, यह बंधन है। जब मन समस्त अनुभव से असंग है, यह मुक्ति है।

यहाँ स्पष्ट किया गया है कि अनुभव स्वयं समस्या नहीं — जीवन में अनुभव तो होते ही रहेंगे, इन्द्रियाँ काम करती रहेंगी, आँखें देखेंगी, कान सुनेंगे। समस्या है आसक्ति, अर्थात मन का अनुभव से चिपक जाना। यह भेद अत्यंत व्यावहारिक है — इसका अर्थ यह नहीं कि ज्ञानी को इन्द्रिय-अनुभव बंद हो जाते हैं या वह किसी शून्य अवस्था में जीता है; बल्कि यह कि अनुभव होते हुए भी मन उनसे चिपकता नहीं, जैसे पानी की बूँद कमल के पत्ते पर टिकती तो है, पर उसे भिगोती नहीं।

श्लोक ८.४

मूल श्लोक (संस्कृत)

यदा नाहं तदा मोक्षो यदाहं बन्धनं तदा । मत्वेति हेलया किञ्चिन्मा गृहाण विमुञ्च मा ॥ ८-४॥

भावार्थ

जब "मैं" नहीं है, तब केवल मुक्ति है। जब "मैं" प्रकट होता है, बंधन उसके साथ ही प्रकट होता है। यह जानकर, स्वीकार और अस्वीकार से विरत रहना सहज हो जाता है।

अंतिम श्लोक पूरे अध्याय की जड़ तक पहुँच जाता है — "मैं" का भाव ही बंधन का मूल है, इच्छा या अनासक्ति उसकी शाखाएँ मात्र हैं। जहाँ "मैं" उठता ही नहीं, वहाँ बंधन के लिए कोई आधार शेष नहीं रहता। इसीलिए यह सहज हो जाता है — जबरदस्ती का त्याग नहीं, स्वाभाविक शिथिलन। यह श्लोक पूरे अध्याय की संरचना को समझने की कुंजी भी है — पहले तीन श्लोकों में जो लक्षण गिनाए गए (इच्छा, शोक, आसक्ति आदि) वे सब वास्तव में "मैं" के भाव की ही उप-शाखाएँ हैं; यह अंतिम श्लोक उस मूल जड़ को उजागर करता है जहाँ से ये सभी शाखाएँ फूटती हैं।

चार श्लोकों में अष्टावक्र ने बंधन और मुक्ति की गुत्थी को पूर्णतः सुलझा दिया। अगले अध्याय में वे इसी आधार पर वैराग्य के मार्ग का विस्तार से वर्णन करेंगे। -e